परिवर्तन ही ‘स्थायी’ है
समझता है आदमी
तभी तो बदल लेता है,
खुद को समय के साथ
अपना पूरा किरदार
और बदल डालता है साथ में
सोच, फितरत, स्वभाव सबकुछ।
बदलावों के इस बवंडर में,
फंस कर बदल जाते हैं
लफ्जों के मायने भी
शब्द वही रहते हैं
शब्दकोश वही रहते हैं
बदल जाते हैं तो बस
लफ्जों के मायने
लड़ना बुराई से
देना सच का साथ
कहलाता था साहस कभी
पर बदल गए हैं पूरी तरह
साहस के मायने आज
चोर को चोर कहना
दलाल को दलाल कहना
और कहना दोगले को दोगला
‘साहस’ से भी बढ़कर
आज हो चला है ‘पराक्रम’
और यह भी सच है समाज का
कि हर आदमी हो नहीं सकता पराक्रमी
इस लिए उसने खोज निकाला है रास्ता
रास्ता ‘शालीनता’ की चादर ओढ़
बन जाने का ‘सुसभ्य’ और ‘लोकतांत्रिक’
- - -तो अब सभ्य, शालीन और लोकतांत्रिक
आदमी के मुंह से लिकलेंगे भला कैसे
दोगला, चोर, दलाल जैसे सस्ते शब्द
इस लिए गढ़ लिया गया है
एक ‘सुसभ्य’ सा नया संबोधन
चोर-दलाल-दोगले सबको
समेट लिया है बस एक लफ्ज में
क्या है बोलो वह शब्द !
ठीक कहा, ‘माननीय’ ।
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24 जून 2009
13 जून 2009
ठीक कहा था डार्विन तुमने
ठीक कहा था डार्विन तुमने,
सदियों पहले, ठीक कहा था ।
विज्ञान की आड़ में छुप कर,
समाज का गहरा-नंगा सच ।
दुरुस्त थीं सौ फीसदी,
अनुकूलन-प्राकृतिक चयन की
तुम्हारी दोनों ही अवधारणाएं
और सटीक था एकदम
योग्यतम की उत्तरजीविता का
वह विश्वव्यापी सिद्धांत ।
फलसफा कि जीने के लिए
चुना जाता है उन्हीं को बस
जो होते हैं समाज में ‘योग्यतम’ ।
कि ‘योग्यता’ ही तो बन गया है आज
मेमने की खाल ओढ़कर बैठ जाना,
आदमी होकर भी भेड़ सरीखा मिमियाना ।
हंसते-खेलते सीख ले जो
मिमियाने की यह कला ।
वही है सबसे क़ाबिल
वही है सबसे ‘अनुकूल’।
उसी को चुनेगी ‘व्यवस्था’
उसी को देगी फूल ।
उसी को चुनेगी ‘व्यवस्था’
कि खालिस आदमी चुनने में
छिपे पड़े हैं खतरे बेशुमार ।
खतरा आवाज उठाने जाने का,
खतरा अपना दिमाग चलाने का
और इस सबसे कहीं बढ़कर
खतरा खुद काबिज हो जाने का ।
इसीलिए आदमी से मेमना ही भला है।
वाकई ‘अनुकूलन’ ही आज
आदमी की सबसे बड़ी कला है ।
सदियों पहले, ठीक कहा था ।
विज्ञान की आड़ में छुप कर,
समाज का गहरा-नंगा सच ।
दुरुस्त थीं सौ फीसदी,
अनुकूलन-प्राकृतिक चयन की
तुम्हारी दोनों ही अवधारणाएं
और सटीक था एकदम
योग्यतम की उत्तरजीविता का
वह विश्वव्यापी सिद्धांत ।
फलसफा कि जीने के लिए
चुना जाता है उन्हीं को बस
जो होते हैं समाज में ‘योग्यतम’ ।
कि ‘योग्यता’ ही तो बन गया है आज
मेमने की खाल ओढ़कर बैठ जाना,
आदमी होकर भी भेड़ सरीखा मिमियाना ।
हंसते-खेलते सीख ले जो
मिमियाने की यह कला ।
वही है सबसे क़ाबिल
वही है सबसे ‘अनुकूल’।
उसी को चुनेगी ‘व्यवस्था’
उसी को देगी फूल ।
उसी को चुनेगी ‘व्यवस्था’
कि खालिस आदमी चुनने में
छिपे पड़े हैं खतरे बेशुमार ।
खतरा आवाज उठाने जाने का,
खतरा अपना दिमाग चलाने का
और इस सबसे कहीं बढ़कर
खतरा खुद काबिज हो जाने का ।
इसीलिए आदमी से मेमना ही भला है।
वाकई ‘अनुकूलन’ ही आज
आदमी की सबसे बड़ी कला है ।
12 जून 2009
ठीक कहा था डार्विन
ठीक कहा था डार्विन तुमने,
सदियों पहले, ठीक कहा था ।
विज्ञान की आड़ में छुप कर,
समाज का गहरा-नंगा सच ।
दुरुस्त थीं सौ फीसदी,
अनुकूलन-प्राकृतिक चयन की
तुम्हारी दोनों ही अवधारणाएं
और सटीक था एकदम
योग्यतम की उत्तरजीविता का
वह विश्वव्यापी सिद्धांत ।
फलसफा कि जीने के लिए
चुना जाता है उन्हीं को बस
जो होते हैं समाज में ‘योग्यतम’ ।
कि ‘योग्यता’ ही तो बन गया है आज
मेमने की खाल ओढ़कर बैठ जाना,
आदमी होकर भी भेड़ सरीखा मिमियाना ।
हंसते-खेलते सीख ले जो
मिमियाने की यह कला ।
वही है सबसे क़ाबिल
वही है सबसे ‘अनुकूल’ ।
उसी को चुनेगी ‘व्यवस्था’
उसी को देगी फूल ।
उसी को चुनेगी ‘व्यवस्था’
कि खालिस आदमी चुनने में
छिपे पड़े हैं खतरे बेशुमार ।
खतरा आवाज उठाने जाने का,
खतरा अपना दिमाग चलाने का
और इस सबसे कहीं बढ़कर
खतरा खुद काबिज हो जाने का ।
इसीलिए आदमी से मेमना ही भला है।
वाकई ‘अनुकूलन’ ही आज
आदमी की सबसे बड़ी कला है ।
सदियों पहले, ठीक कहा था ।
विज्ञान की आड़ में छुप कर,
समाज का गहरा-नंगा सच ।
दुरुस्त थीं सौ फीसदी,
अनुकूलन-प्राकृतिक चयन की
तुम्हारी दोनों ही अवधारणाएं
और सटीक था एकदम
योग्यतम की उत्तरजीविता का
वह विश्वव्यापी सिद्धांत ।
फलसफा कि जीने के लिए
चुना जाता है उन्हीं को बस
जो होते हैं समाज में ‘योग्यतम’ ।
कि ‘योग्यता’ ही तो बन गया है आज
मेमने की खाल ओढ़कर बैठ जाना,
आदमी होकर भी भेड़ सरीखा मिमियाना ।
हंसते-खेलते सीख ले जो
मिमियाने की यह कला ।
वही है सबसे क़ाबिल
वही है सबसे ‘अनुकूल’ ।
उसी को चुनेगी ‘व्यवस्था’
उसी को देगी फूल ।
उसी को चुनेगी ‘व्यवस्था’
कि खालिस आदमी चुनने में
छिपे पड़े हैं खतरे बेशुमार ।
खतरा आवाज उठाने जाने का,
खतरा अपना दिमाग चलाने का
और इस सबसे कहीं बढ़कर
खतरा खुद काबिज हो जाने का ।
इसीलिए आदमी से मेमना ही भला है।
वाकई ‘अनुकूलन’ ही आज
आदमी की सबसे बड़ी कला है ।
10 जून 2009
चैराहे नहीं रहे अब वैसे
चैराहे नहीं रहे अब वैसे
पहले से अल्हड, ठहरे-ठहरे से
हर ओर मची है भागमभाग
आदमी भाग रहा है,
सडकें भाग रही हैं
पीछे-पीछे भाग रहा है चैराहा ।
नेता जी को जरूरत नहीं पड़ती,
आने की अब चैराहे पर
कि जनता से जुड़ने की
जरूरत ही नहीं रही
सियासत के रंग-ढंग
दोनों ही बदल चुकें हैं अब
नहीं करते वोट की राजनीति वह अब
बन गए हैं सत्ता के ‘फें्रचाइजी’
लड़ते नहीं चुनाव अब
करते हैं महज दलाली
लोकसभा-विधानसभा में,
विश्वास-अविश्वास मत पर
वोटिंग कराने, न कराने
सरकार बचाने की
सरकार गिराने की
करके जनता के विश्वास की हत्या
बन गए विश्वास-अविश्वास के दलाल
गलियां, सडकें, राजपथ
सब इनसे थर्राते है
पीछे-पीछे अब इनके भाग रहा है चैराहा
चैराहे नहीं रहे अब वैसे
पहले से अल्हड, ठहरे-ठहरे से ।
पहले से अल्हड, ठहरे-ठहरे से
हर ओर मची है भागमभाग
आदमी भाग रहा है,
सडकें भाग रही हैं
पीछे-पीछे भाग रहा है चैराहा ।
नेता जी को जरूरत नहीं पड़ती,
आने की अब चैराहे पर
कि जनता से जुड़ने की
जरूरत ही नहीं रही
सियासत के रंग-ढंग
दोनों ही बदल चुकें हैं अब
नहीं करते वोट की राजनीति वह अब
बन गए हैं सत्ता के ‘फें्रचाइजी’
लड़ते नहीं चुनाव अब
करते हैं महज दलाली
लोकसभा-विधानसभा में,
विश्वास-अविश्वास मत पर
वोटिंग कराने, न कराने
सरकार बचाने की
सरकार गिराने की
करके जनता के विश्वास की हत्या
बन गए विश्वास-अविश्वास के दलाल
गलियां, सडकें, राजपथ
सब इनसे थर्राते है
पीछे-पीछे अब इनके भाग रहा है चैराहा
चैराहे नहीं रहे अब वैसे
पहले से अल्हड, ठहरे-ठहरे से ।
9 जून 2009
क़ाफिले दोस्तों के
क़ाफिले दोस्तों के क्या देंगे,
घाव पर घाव इक नया देंगे ।
इस भरोसे पे चोट खाए चलो,
ज़ख्म अपने ही हौसला देंगे ।
क़ाफिले दोस्तों के क्या देंगे- - -
वो मसाहत का दम जो भरते हैं
जान हम पल लुटाए फिरते हैं
खुद ही तोड़ेंगे क़यामत इक दिन
हंस के सूली हमे चढ़ा देंगे ।
फिर करीने से मुस्करा देंगे
क़ाफिले दोस्तों के क्या देंगे- - -
अब तो हर ओर,
वही इक फरेब का मंजर ।
मीठी मुस्कानों में,
लिपटे हुए खूनी खंजर ।
चलो ! किसी को जहां में,
मेरी तलाश सही ।
अजीज मैं न सही,
फिर कि लाश सही,
उनकी इस तिश्नगी पर,
हम अपना लहू बहा देंगे ।
क़ाफिले दोस्तों के क्या देंगे
घाव पर घाव इक नया देंगे ।
इस भरोसे पे चोट खाए चलो,
ज़ख्म अपने ही हौसला देंगे ।
क़ाफिले दोस्तों के क्या देंगे- - -
वो मसाहत का दम जो भरते हैं
जान हम पल लुटाए फिरते हैं
खुद ही तोड़ेंगे क़यामत इक दिन
हंस के सूली हमे चढ़ा देंगे ।
फिर करीने से मुस्करा देंगे
क़ाफिले दोस्तों के क्या देंगे- - -
अब तो हर ओर,
वही इक फरेब का मंजर ।
मीठी मुस्कानों में,
लिपटे हुए खूनी खंजर ।
चलो ! किसी को जहां में,
मेरी तलाश सही ।
अजीज मैं न सही,
फिर कि लाश सही,
उनकी इस तिश्नगी पर,
हम अपना लहू बहा देंगे ।
क़ाफिले दोस्तों के क्या देंगे
7 जून 2009
लेमार्क तुम गलत थे
लेमार्क तुम गलत थे
और तुम्हारी ही तरह झूठा था
‘ अंगों की उपियोगिता ’ का वह सिद्धांत
कि विलुप्त हो जाते हैं अनुपयोगी अंग
और उपियोगियों का होता है भरपूर विकास
ऐसा होता हकीकत में अगर
क्यों विलुप्त हो जाती सदियों पहले,
आदमी के शरीर से दुम
दुम जिसकी पड़ती है जरूरत
जिंदगी में हर कदम
दफ्तर-घर-समाज हर जगह
‘ मालिक ’ बदल जाता है
आदमी वही रहता है हर जगह
दुम हिलाता सा उसी तरह ।
लेमार्क तुम गलत थे- - -
कि विकसित हो गई आदमी के जिस्म में,
बेवजह एक अदद रीढ़
रीढ़, जिसकी कहीं भी कोई जरूरत नहीं
दफ्तर में, घर में, समाज में कहीं नहीं
कि बेदम रेंगता रहता है इंसान
पैरो तले मसलने वाले बदल जाते हैं
पर रहता वही है पिसता-कराहता आदमी
हर वक्त, हर जगह, हर तरह
- - - लेमार्क तुम गलत थे ।
और तुम्हारी ही तरह झूठा था
‘ अंगों की उपियोगिता ’ का वह सिद्धांत
कि विलुप्त हो जाते हैं अनुपयोगी अंग
और उपियोगियों का होता है भरपूर विकास
ऐसा होता हकीकत में अगर
क्यों विलुप्त हो जाती सदियों पहले,
आदमी के शरीर से दुम
दुम जिसकी पड़ती है जरूरत
जिंदगी में हर कदम
दफ्तर-घर-समाज हर जगह
‘ मालिक ’ बदल जाता है
आदमी वही रहता है हर जगह
दुम हिलाता सा उसी तरह ।
लेमार्क तुम गलत थे- - -
कि विकसित हो गई आदमी के जिस्म में,
बेवजह एक अदद रीढ़
रीढ़, जिसकी कहीं भी कोई जरूरत नहीं
दफ्तर में, घर में, समाज में कहीं नहीं
कि बेदम रेंगता रहता है इंसान
पैरो तले मसलने वाले बदल जाते हैं
पर रहता वही है पिसता-कराहता आदमी
हर वक्त, हर जगह, हर तरह
- - - लेमार्क तुम गलत थे ।
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