2 मार्च 2010

मंदी, महंगाई, सूखे से सीखा नहीं सबक

मंदी,सूखे और महंगाई की तिहरी मार के बाद पेश किए गए इस बजट में देखने वाली सबसे बड़ी बात यह थी कि संकट के इस दौर से हमारी सरकार ने क्या सबक सीखा। वित्त मंत्री का बजट भाषण सुनने के बाद स्पष्टï है कि हमारे नीति-नियंताओं ने आफत के इस दौर से कोई सबक नहीं लिया।
बजट में ग्रामीण विकास पर जोर, २०१२ तक हर गांव में बैंक खोलने, ग्रामीण विकास के लिए ६० हजार करोड़, मनरेगा के लिए ४० हजार करोड़ और पांच फूड पार्क बनाने की बातें ऊपरी तौर पर लुभावनी लगती है। किसानों को दो फीसदी छूट केसाथ पांच फीसदी ब्याज पर कर्ज देने और की बात भी कही गई है, कर्ज अदायगी की अवधि भी बढ़ाई गई है। सूखा प्रभावित बुंदेलखंड को १२०० करोड़ का आवंटन किया गया है। इन 'लोकप्रियÓ घोषणाओं के बावजूद बजट में हरित क्रांति केलिए केवल ४०० करोड़ रुपये दिया जाना खासा अखरने वाला है।
बजट में अंतिम रूप से सबसे ज्यादा जोर देश को ऊंची विकास दर के आंकड़े पर पहुंचाना और राजकोषीय घाटे को किसी भी तरह घटाने पर रहा। घाटा घटाने की बात तो ठीक है, पर ऊंची विकास दर का राग फिर से अलापना ढाक के तीन पात वाली कहावत को ही चरितार्थ करता है।
गौर कीजिए वैश्विक आर्थिक संकट के उन दिनों को जब अमेरिका समेत विश्व के तमाम विकसित देशों के पसीने छूट गए थे। ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली और जापान जैसे धनवान देशों को भी मंदी ने खूब छकाया। हालात चीन में भी खराब होने लगे थे। गौर करने वाली बात है कि मंदी से ग्रस्त इन सभी देशों की विकास दर काफी ऊंची थी। अपना देश भी आठ फीसदी के स्तर पर था, पर विकास दर के इस आंकड़े ने मंदी में भला हमारी क्या मदद की? भारत अगर मंदी को खामोशी और धैर्य के साथ झेल गया तो इसका श्रेय ऊची विकास दर को नहीं, हमारे आर्थिक ढांचे के जमीन से जुड़ा होने को जाता है। मंदी ने आईटी, सॉफ्टवेयर, बैंकिंग, निर्माण, निर्यात और सेवा क्षेत्र को तो प्रभावित किया पर हमारे मंदी हमारे अर्थतंत्र की जड़ें नहीं हिला पाई। मंदी भारत के आम आदमी के मुंह से निवाला इस लिए नहीं छीन पाई कि अपनी जरूरतें पूरी करने भर का अनाज हम करीब-करीब खुद ही पैदा कर लेते हैं। यही वजह थी की आर्थिक रूप से संपन्न न होकर भी आम आदमी बिना दिक्कत जीता-खाता रहा। उस समय हमारे अर्थतंत्र तंत्र की इस ताकत को प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री, योजना आयोग के उपाध्यक्ष समेत आर्थिक नीति-निर्धारण से जुड़े हर महत्वपूर्ण व्यक्ति ने महसूस किया था। लग रहा था कि खेत-खलिहानों के महत्व को समझते हुए इस साल के बजट में कृषि को महत्व देगी। कृषि, सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण आदि के आवंटन में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की जाएगी। पर बजट में ऐसा कुछ खास हुआ नहीं। किसानों को सस्ता कर्ज उपलब्ध कराने की बात ऊपरी तौर पर कल्याणकारी लग सकती है, पर गहराई में जाकर देखें तो इसकी तासीर किसानों के लिए विध्वंसकारी ही साबित होने वाली है। बहुत सामान्य सी बात है कि आदमी को जहां तक संभव हो कर्ज से बचना चाहिए। इसलिए सस्ता कर्ज उपलब्ध कराने से बेहतर यह होता कि सरकार बजट में कुछ ऐसे इंतजाम करती कि किसान को कर्ज लेने की जरूरत ही न पड़े। गांवों में बैंक खोलने से भला क्या होगा अगर किसान के पास जमा करने को पैसे ही न हों। जाहिर है वह कर्ज के लिए ही बैंकों के चक्कर लगाएगा और और आखिरकार खुद को एक दुष्चक्र में फंसा लेगा। क्या यही हमारी सरकार की मंशा है? यह दुष्चक्र भी दोहरा होगा क्योंकि एक तरफ तो किसान पर कर्ज का बोझ चढ़ेगा दूसरी ओर लोन पास कराने, और उसकी अदायगी आदि को लेकर बाबुओं-अफसरों का शिकंजा भी उसकी गर्दन पर कसेगा। उनकी मु_ïी गरम करने के लिए भी उसे बार-बार जेब ढीली करनी होगी।
किसानों को सरकारी सहायता और सस्ते कर्ज की व्यवस्था किस तरह खोखली और बेअसर साबित होती हैं इसकी बानगी हम इस साल सूखे के वक्त देख ही चुके हैं। मानसून नेनाराजगी दिखाई तो सारी सरकारी योजनाएं कागजों पर ही धरी की धरी रह गईं। ऐसे कठिन हालात से गुजरने के बाद लग रहा था कि बजट में एफआईआई, एफआईआई की उधार की शान और आईटी, सॉफ्टवेयर और निर्यात जैसे हवाई बुलबुलों से सतर्क रहने के तेवर दिखेंगे। अर्थव्यवस्था को एक बार फिर जमीन से जोडऩे की कवायद होगी, पर बजट में इसके लिए कोई ठोस कोशिश नजर नहीं आई।
(अमर उजाला 'कॉम्पैक्ट के बजट अंक से साभार)

1 टिप्पणी:

  1. बहुत अच्छा । बहुत सुंदर प्रयास है। जारी रखिये ।

    हिंदी को आप जैसे ब्लागरों की ही जरूरत है ।


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