26 जुलाई 2010
आईबीएन-७ का ये मदारीपन!
स्टोरी को टाइटिल दिया गया 'आ बैल मुझे मारÓ। क्या बेहूदापन है यह। क्या बैल को बचाने वाला डाक्टर निरा अनपढ़ और बुद्धिहीन था। क्या उसे पता नहीं था कि बैल का क्या स्वभाव होता है? क्या उसे पता नहीं था कि कुएं में उतरना खुद अपनी जान जोखिम में डालना है। इसके बावजूद वह बैल को बचाने केलिए उसे इंजेक्शन लगाने कुएं में उतरता है। फुटेज देखकर साफ लगता है कि डाक्टर अगर चाहता तो बैल का मिजाज देखते ही सीढ़ी से वापस ऊपर चढ़ सकता था, पर उसने ऐसा नहीं किया। वह बैल को बेहोश करने की जद्दोजहद करता रहा और इस दौरान बैल केहमले की चपेट में आकर बुरी तरह घायल हो गया। डाक्टर की इस दिलेरी और बैल के प्रति उसके दया भाव के बदले चैनल के 'बुद्धिजीवीÓ पत्रकारों ने उलटे उसे एक निरे मूर्ख की तरह प्रोजेक्ट किया, मानो वह बैल को बचाने नही जानबूझ कर खुदकुशी करने कुएं में उतरा हो कि आ 'आ बैल मुझे मारÓ। स्टोरी के शीर्षक का अर्थ तो कम से कम यही निकलता है।
दरअसल मीडिया के रुटीन प्रैक्टिस बन चुकी इस तरह की कलंदरबाजी ही आए दिनों उसकी फजीहत और मलामत की वजह बन रही है। लोग चैनल वालों के मुंह पर थूक रहे हैं, पर उन्हें इससे न कोई फर्क है न फुर्सत। बैल से जुड़ी स्टोरी देख न्यूज रूप में बैठे 'महाकाबिलÓ पत्रकार केदिमाग में 'आ बैल मुझे मारÓ का मुहावरा फ्लैश कर गया। दिमाग की अपनी सीमाएं होती हैं भई! इससे आगे उसकी बुद्धि जा ही नहीं सकती। आखिरकार उसे बैठाया ही गया है लच्छेदार शब्दों में डॉयलॉगनुमा स्टोरी लिखने और उस पर अनुप्रास में डूबी 'चमत्कारिकÓ और 'मारकÓ हेडिंग लगाने केलिए। कंबख्त ने बड़ी शिद्दत से अपना काम किया। कर्ताधर्ताओं को भी स्टोरी काफी 'मजेदारÓ लगी, सो ऑन एयर कर दी गई तुरत-फुरत में। यह बात और है कि स्टोरी को उसकेसही एंगिल से भी उठाया जा सकता था, पर इसके लिए पत्रकारिता केएथिक्स की समझ चाहिए। स्टोरी से लोगों पर पडऩे वाले प्रभाव और खुद चैनल की छवि पर पडऩे वाले असर के बारे में सोचने का वक्त चाहिए। बस दिक्कत यहीं आती है। वक्त ही तो नहीं है शायद आज मीडिया के कर्ताधर्ताओं केपास और सोचने-समझने का विवेक तो दौड़-भाग भरे वर्क कल्चर ने यूं ही हर लिया है। लिहाजा चला दी स्टोरी 'लीडÓ लेने केलिए, लोग हंसें तो हंसते रहें। आखिर हंसना सेहत केलिए खासा फायदेमंद जो है। कितनी 'नेकÓ सोच है आईबीएन-७ वालों की। है न!!!
2 मार्च 2010
मंदी, महंगाई, सूखे से सीखा नहीं सबक
बजट में ग्रामीण विकास पर जोर, २०१२ तक हर गांव में बैंक खोलने, ग्रामीण विकास के लिए ६० हजार करोड़, मनरेगा के लिए ४० हजार करोड़ और पांच फूड पार्क बनाने की बातें ऊपरी तौर पर लुभावनी लगती है। किसानों को दो फीसदी छूट केसाथ पांच फीसदी ब्याज पर कर्ज देने और की बात भी कही गई है, कर्ज अदायगी की अवधि भी बढ़ाई गई है। सूखा प्रभावित बुंदेलखंड को १२०० करोड़ का आवंटन किया गया है। इन 'लोकप्रियÓ घोषणाओं के बावजूद बजट में हरित क्रांति केलिए केवल ४०० करोड़ रुपये दिया जाना खासा अखरने वाला है।
बजट में अंतिम रूप से सबसे ज्यादा जोर देश को ऊंची विकास दर के आंकड़े पर पहुंचाना और राजकोषीय घाटे को किसी भी तरह घटाने पर रहा। घाटा घटाने की बात तो ठीक है, पर ऊंची विकास दर का राग फिर से अलापना ढाक के तीन पात वाली कहावत को ही चरितार्थ करता है।
गौर कीजिए वैश्विक आर्थिक संकट के उन दिनों को जब अमेरिका समेत विश्व के तमाम विकसित देशों के पसीने छूट गए थे। ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली और जापान जैसे धनवान देशों को भी मंदी ने खूब छकाया। हालात चीन में भी खराब होने लगे थे। गौर करने वाली बात है कि मंदी से ग्रस्त इन सभी देशों की विकास दर काफी ऊंची थी। अपना देश भी आठ फीसदी के स्तर पर था, पर विकास दर के इस आंकड़े ने मंदी में भला हमारी क्या मदद की? भारत अगर मंदी को खामोशी और धैर्य के साथ झेल गया तो इसका श्रेय ऊची विकास दर को नहीं, हमारे आर्थिक ढांचे के जमीन से जुड़ा होने को जाता है। मंदी ने आईटी, सॉफ्टवेयर, बैंकिंग, निर्माण, निर्यात और सेवा क्षेत्र को तो प्रभावित किया पर हमारे मंदी हमारे अर्थतंत्र की जड़ें नहीं हिला पाई। मंदी भारत के आम आदमी के मुंह से निवाला इस लिए नहीं छीन पाई कि अपनी जरूरतें पूरी करने भर का अनाज हम करीब-करीब खुद ही पैदा कर लेते हैं। यही वजह थी की आर्थिक रूप से संपन्न न होकर भी आम आदमी बिना दिक्कत जीता-खाता रहा। उस समय हमारे अर्थतंत्र तंत्र की इस ताकत को प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री, योजना आयोग के उपाध्यक्ष समेत आर्थिक नीति-निर्धारण से जुड़े हर महत्वपूर्ण व्यक्ति ने महसूस किया था। लग रहा था कि खेत-खलिहानों के महत्व को समझते हुए इस साल के बजट में कृषि को महत्व देगी। कृषि, सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण आदि के आवंटन में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की जाएगी। पर बजट में ऐसा कुछ खास हुआ नहीं। किसानों को सस्ता कर्ज उपलब्ध कराने की बात ऊपरी तौर पर कल्याणकारी लग सकती है, पर गहराई में जाकर देखें तो इसकी तासीर किसानों के लिए विध्वंसकारी ही साबित होने वाली है। बहुत सामान्य सी बात है कि आदमी को जहां तक संभव हो कर्ज से बचना चाहिए। इसलिए सस्ता कर्ज उपलब्ध कराने से बेहतर यह होता कि सरकार बजट में कुछ ऐसे इंतजाम करती कि किसान को कर्ज लेने की जरूरत ही न पड़े। गांवों में बैंक खोलने से भला क्या होगा अगर किसान के पास जमा करने को पैसे ही न हों। जाहिर है वह कर्ज के लिए ही बैंकों के चक्कर लगाएगा और और आखिरकार खुद को एक दुष्चक्र में फंसा लेगा। क्या यही हमारी सरकार की मंशा है? यह दुष्चक्र भी दोहरा होगा क्योंकि एक तरफ तो किसान पर कर्ज का बोझ चढ़ेगा दूसरी ओर लोन पास कराने, और उसकी अदायगी आदि को लेकर बाबुओं-अफसरों का शिकंजा भी उसकी गर्दन पर कसेगा। उनकी मु_ïी गरम करने के लिए भी उसे बार-बार जेब ढीली करनी होगी।
किसानों को सरकारी सहायता और सस्ते कर्ज की व्यवस्था किस तरह खोखली और बेअसर साबित होती हैं इसकी बानगी हम इस साल सूखे के वक्त देख ही चुके हैं। मानसून नेनाराजगी दिखाई तो सारी सरकारी योजनाएं कागजों पर ही धरी की धरी रह गईं। ऐसे कठिन हालात से गुजरने के बाद लग रहा था कि बजट में एफआईआई, एफआईआई की उधार की शान और आईटी, सॉफ्टवेयर और निर्यात जैसे हवाई बुलबुलों से सतर्क रहने के तेवर दिखेंगे। अर्थव्यवस्था को एक बार फिर जमीन से जोडऩे की कवायद होगी, पर बजट में इसके लिए कोई ठोस कोशिश नजर नहीं आई।
(अमर उजाला 'कॉम्पैक्ट के बजट अंक से साभार)
9 फ़रवरी 2010
मीडिया का ये 'जी-फैक्टर '
'ज्ञानोदय' के मीडिया विशेषांक में पत्रकारिता की दुनिया के 'बड़े लोगोंÓ अनुभवों और संस्मरणों के रास्ते कहीं न कहीं मीडिया के चाल-चरित्र में हाल के वर्षों में आए बदलाव की झलक देखने को मिली। विनोद दुआ ने अपने आलेख में पत्रकारिता की चुनौतियों के एक व्यावहारिक पहलू को छूते हुए गंभीर सवाल उठाया है। सवाल पत्रकारिता में उभरती एक नई प्रवृत्ति, गहरे में जाएं तो उसके बदलते चरित्र को लेकर है। मुद्दा है पत्रकारिता में उभरते 'जी-फैक्टर' का। दुआ साहब का आब्जर्वेशन है कि भाजपा को कवर करने वाले बहुत से पत्रकार अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के नाम के आगे 'जी' लगाते लगाते हैं। वह सवाल उठाते हैं कि क्या पत्रकारों का बे्रनवॉश किया जा रहा है गांधीजी और नेताजी आदि महापुरुषों के समकक्ष 'अटल जी' और 'आडवाणी जी' को प्रतिष्ठïापित करने के लिए। इस अजीबोगरीब चलन केपीछे आदत या 'व्यावहारिकताÓ की संभावनाओं को दरकिनार करते हुए वह यह भी पूछते हैं कि ऐसा सोनिया गांधी, मनामोहन सिंह, जैसी कांगे्रस की कद्दावर हस्तियों के साथ देखने को क्यों नहीं मिलता। भाजपा के भी मुरली मनोहर जोशी, जसवंत सिंह (फिलहाल निष्काषित) सरीखे अन्य वरिष्ठï नेताओं के नाम के साथ भी कोई जी नहीं लगाता। तो आखिर इस अटल-आडवाणी से जुड़े इस 'जी-फैक्टर' की वजह क्या है?
गहराई से देखें तो इन सवालों का जवाब खुद सवालों में ही छिपा नजर आता है। गौर करने वाली बात यह है कि संवाददाताओं में यह प्रवृत्ति पिछले एक दशक के कुछ वर्षों से ही देखने को मिल रही है। यानि भाजपा के केंद्रीय सत्ता में आने के बाद से। इससे पहले वही अटल-आडवाणी थे, मीडिया वही था, पर खबरों में 'जी' शब्द सुनाई नहीं देता था। जाहिर है यह 'कमाल' कहीं न कहीं भाजपा के हाथ सत्ता आने के साथ जुड़ा हुआ है। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि भाजपा के सत्तासीन होने का यह दशक मीडिया के लिए भी तेजी से विस्तार का दशक था। साथ ही साथ चाल-चरित्र और दिशा के लिहाज से उसके लिए यह एक संक्रमण-काल भी था। 'चैनल क्रांति' के इन वर्षों में एक के बाद एक न्यूज चैनलों की झड़ी लग गई। जाहिर है, इन चैनलों को चलाने के लिए बड़ी संख्या में पत्रकारों की जरूरत पड़ी। इस बहती गंगा में नहाने का सबसे ज्यादा 'पुण्य' मिला दिल्ली के उन पत्रकारों को जो सियासी गलियारों में टहलते फिरते थे। वर्षों से उनके लिए आसानी से उपलब्ध रहे कई भाजपा नेताओं के सिरों पर अब लाल बत्ती की आभा चमक रही थी। नेताओं के इस 'अपग्रेडेशन' का लाभ उनसे 'जुड़े' पत्रकारों को मिला चैनलों में भारी-भरकम पैकेज वाली नौकरियों के रूप में। पत्रकारिता में 'जी-फैक्टर' का प्रवेश इसी रास्ते हुआ जान पड़ता है। अचानक से चार-चार गुनी तन्ख्वाह पाने वाले पत्रकारों की 'उपकृत और चमत्कृत' यह जमात नेताजी के एहसान का बोझ ढो रही थी। उन नेताओं के 'सिफारिशी-उपकार' का बोझ, जिनके लिए अटल 'अटल जी' और आडवाणी 'आडवाणी जी' थे। नए-नए 'अपग्रेडेशन' के चलते यह नेता और पत्रकार दोनों थोड़े कच्चे साबित हुए। न तो भाजपा को अभी कांगे्रस की तरह 'सोफेस्टिकेटेड' ढंग से मीडिया को मैनेज करना आया था, न यह पत्रकार पूरी तरह से 'हाईफाई और टैक्टफुलÓ हो सके थे। आपसी बातचीत में दोनों ही 'अटल जी-आडवाणी जी' संबोधनों का इस्तेमाल करते थे। उनका यह कच्चापन (पेशे के लिहाज 'फूहड़पनÓ कहना ज्यादा उपयुक्त होगा) ही खबरों के पीटीसी, वाइस ओवर, और फोनो आदि में 'अटल जी-आडवाणी जी' के रूप में फूट पड़ता था।
यह तो रही संवाददाताओं के स्तर पर चूक की बात, पर बात यहीं खत्म नहीं होती, क्योंकि संवाददाता तो बाइट की पहली कड़ी होता है, आखिरी नहीं। उसके किए को धोने-पछारने का काम डेस्क का होता है। 'जी' अगर अनुचित और आपत्तिजनक था तो डेस्क के स्तर पर इसे काटा-छांटा जा सकता था और संवाददाता को आगे से इसका इस्तेमाल न करने की नसीहत दी जा सकती थी, पर ऐसा नहीं हुआ। बाइटें जी-फैक्टर के साथ चलती रहीं। चैनलों के आउटपुट हेड और संपादक जैसे कर्ताधर्ता और नीति-नियंताओं को भी इस भटकाव से दोषमुक्त नहीं रखा जा सकता (दुआ साहब खुद भी इसी कैटेगरी में आते हैं)। 'अटल जी-आडवाणी जी' का जाप करने वाले संवाददाताओं की क्लास लेने का अधिकार इनके पास हमेशा की तरह सुरक्षित था। इसके बावजूद अगर इन्होंने कुछ नहीं किया जो इसमें इनकी भी मौन सहमति क्यों न मानी जाए? जाहिर है, 'मीडिया-उदय' के इस कालखंड में मीडिया-क्षितिज के तारों-सितारों रोशनी ही धूमिल नहीं हुई, बल्कि उसे 'प्रकाशित' करने वाले करने वाले 'सूरज-चंदा' भी ग्रहण की चपेट में अपना तेज खो रहे थे।
बहरहाल, अटल जी-आडवाणी जी का युग तो गुजर गया, पर इस मुद्दे की जड़ से जुड़ा सवाल अब भी अपनी जगह कायम है। सवाल है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में होने वाली जुगाड़ू भर्तियों का। आज भी मीडिया (खासकर चैनलों) में अधिसंख्य नियुक्तियां जुगाड़, सिफारिश और रसूख के सास्ते ही हो रही हैं। आज केदौर में सड़कों पर घूमने-टहलने और आसानी से किसी से भी मिल लेने वाले (एसपी सिंह सरीखे) संपादक चैनलों में लेंस, दूरबीन या माइक्रोस्कोप लेकर ढूंढने से नहीं मिलते। सूट-टाई में सजे-धजे संपादक की एसी गाड़ी से उतरते हैं और दायें-बायें देखे बिना सीधे केबिन में जाकर रिवॉल्विंग चेयर पर आसीन हो जाते हैं। उनसे मिलने की राह अब सड़कों नहीं, सत्ता के गलियारों से ही गुजरती है। स्वाभाविक है मीडिया में जब दाखिला जमीन के बजाए आकाश के रास्ते होगा तो चरित्र और संस्कारों में ऐसे ही बदलाव आते दिखेंगे ही। इसलिए शिखर पर बैठे लोगों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह इस तरह महज 'मासूम सवाल' उठाने और बौद्धिक चर्चा करने के बजाय इस विकृति के खिलाफ जमीनी तौर पर कुछ करें और जमीन से जुड़े लोगों को मीडिया से जोड़ें। बातें थोड़ी तल्ख और 'छोटा मुंह-बड़ी बात' सरीखी लग सकती हैं, पर सेमिनारों-संगोष्ठिïयों में पत्रकारिता की दशा-दिशा पर दिमागी जुगाली करने वाले मीडिया मु$गल खुद बताएं कि क्या यह सच नहीं और क्या इसके खिलाफ व्यक्तिगत रूप से और प्रभावी ढंग से उन्होंने कभी कुछ करने की कोशिश की है?
एक बड़ा व्यावहारिक सा सवाल है कि क्या आज की तारीख में ऐसा संभव है कि बिना किसी परिचय या रेफरेंस के कोई पत्रकार किसी चैनल में नौकरी के लिए जाए और प्रणव राय, विनोद दुआ, प्रभु चावला, आषुतोश, अलका सक्सेना या अनुराधा प्रसाद (नाम व्यक्ति नहीं, प्रतीक हैं) सरीखी संपादकीय हस्तियों से उसे मुलाकात भर करने को मिल जाए? मीडिया के 'सिस्टमÓ से अच्छी तरह वाकिफ होने के नाते मैंने तो कभी ऐसी 'नादानी' नहीं की, पर बहुतों के अनुभव सुन रखे हैं। कई लोगों ने बताया कि बायोडाटा लेकर नौकरी के लिए जाने पर पागलखाने से छूटकर आए प्राणी की तरह एक भीतरी व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ देखा जाता है और 'कहां-कहां से चले आते हैं' के भाव के साथ रिसेप्शनिस्ट के पास ही बायोडाटा धरवा कर रफा-दफा कर दिया जाता है। 'नंबर वन' का दावा करने वाले चैनलों के बारे में तो सुना है कि गेट पर ही पर ही बायोडाटा 'डंप' करने के लिए बॉक्स रखा रहता है। बायोडाटा डालिए और 'कर्म किए जा, फल की इच्छा मत कर' के भाव से निकल लीजिए। कुछ पूछने की जुरर्रत अगर कर भी ली तो चिड़चिड़ाते लहजे में महज एक लाइन का जवाब सुनने को मिलेगा कि सीवी में फोन नंबर और ई-मेल आईडी दिया है न? जब जरूरत होगी बता दिया जाएगा। चेहरे की भाव-भंगिमा ऐसी तिरस्कार भरी होगी कि 'संसार माया है, क्या लेकर जाएगा-क्या लेकर आया है' का गूढ़ ज्ञान एक झटके में मिल जाता है। बायोडाटा लेकर भीतर गया 'सिद्धार्थ' मिनट भर में 'बुद्ध' बनकर बाहर निकल आता है, 'माया' के इस दलदल में दोबारा कदम न रखने के संकल्प के साथ। बातें अतिरंजनापूर्ण लग रही हों तो नेट खंगाल लीजिए। मीडिया केमारों के बहुत ब्लॉगों पर ऐसी आपबीतीयां पढऩे को मिल जाएंगी। मीडिया जगत में यह बात वर्षों से एक 'अंडर करेंट' की तरह दौड़ रही है। जानता हर कोई है, पर इसके खिलाफ कहता-बोलता और करता कोई कुछ नहीं। मीडिया लोक के 'देवगण' भी पत्रकारिता के मूल्यों में गिरावट पर महज 'प्रवचन' देकर 'दायित्व-निर्वाह' कर लेते हैं। कुछ उसी अंदाज में जैसे कथा बांचने से पहले पंडित जी सबपर गंगाजल छिड़क कर ओम पवित्रम-पवित्रम बुदबुदाते हैं और यह मानते हुए कि सब लोग पवित्र हो गये, कथा शुरू हो जाती है। इसी परिपाटी पर मीडिया-कथा चल रही है। इस कथा वाचन से हटकर हकीकत के धरातल पर कुछ नहीं होता।
आज देश में आईएएस-पीसीएस तो छोडि़ए ड्राइवर-कंडक्टर, क्लर्क और यहां तक कि चपरासी तक बनने के लिए परीक्षा और साक्षात्कार देना पड़ता है, पर पत्रकार बनने के लिए कोई परीक्षा-परीक्षण नहीं होता। रस्म अदायगी के लिए कुछ मिनटों का साक्षात्कार होता है। इस साक्षात्कार की भी क्या कहें! अकसर साक्षात्कार कम, 'बौद्धिक बलात्कार' ज्यादा होता है। कहां से आए हो, वहां कितना (पैसा) मिलता था, क्या देखते थे जैसे दो-चार औपचारिक प्रश्नों के बाद शुरू हो जाती है संपादक जी की अपनी गौरव-गाथा। प्रत्याशी की योग्यता और ज्ञान परखने के बजाए संपादक जी अपनी ही महानता और ज्ञान बघारने में जुट जाते हैं। नौकरी चाहिए तो सुनते रहिए 'कथा शुरू है बलिदानों की, आये मजा कहानी में' के भाव के साथ। वाजपेयी जी की कविता 'चेहरे पर मुस्काने चिपकाये, खुद में ही रोता हूं' मन ही मन गुनिये, मुस्कराइये और श्रद्धापूर्वक पूरा का पूरा 'कथामृत' गटक जाइये। चेहरे पर जितनी श्रद्धा, जितनी हां में हां, उतनी ज्यादा पगार। अपना दिमाग दिखाने की कोशिश कर जरा भी डिस्टर्बेंस क्रिएट किया तो सरकार बुरा मान जाएंगे। ...और फिर तो अरस्तू, सुकरात, आइंस्टाइन क्या उनके बाप भी आ जाएं, संपादक जी घेरकर गिरा ही लेंगे कहीं न कहीं। सवालों की ऐसी झड़ी लगेगी, जिनके जवाब खुद उनको भी ठीक-ठीक नहीं मालूम होंगे। लोकल रिपोर्टिंग के लिए आए हो तो पूछेंगे टिंबकटू कहां है? बुर्कीनाफासो के हालात पर आपका क्या कहना है आपका? मुक्तिबोध की कविताओं में संवेदनाओं की अभिव्यक्ति के लिए प्रयुक्त प्रतीकों पर कुछ प्रकाश डालिए। टार्च तो ले नहीं गए हो, प्रकाश कहां से डालोगे भइया! इसलिए इंटरव्यू में मुस्कुराते हुए 'संपादक-पुराण' सुनो, हां जी-हां जी करो और नौकरी का 'प्रसाद' लेकर बाहर आ जाओ (ज्ञान-वान मत दिखाना, संपादक जी गुस्से हो जाते हैं)। इंटरव्यू के दौरान भी अकसर संपादक जी जल्दी में दिखाई देते हैं। आधे घंटे बाद यूनिवर्सिटी के सेमिनार में जाना है 'मीडिया की गिरती गरिमा : कारण और उपचार' पर व्याख्यान देने। तालियों के बीच मंच पर पहुंचते चालू हो जाते हैं...मीडिया की साख गिर रही है, काबिल और गंभीर लोग पत्रकारिता में नहीं आ रहे हैं, पत्रकारों की तो पढऩे-लिखने में कोई रुचि ही नहीं रह गई है आज...। आधे घंटे पकाने के बाद भावुक होकर कहते हैं मेरी भी उम्र होती जा रही है, चाहता हूं किसी किसी योग्य उत्तराधिकारी को दायित्व सौंप कर किनारे हो लूं। पांच साल से तलाश रहा हूं, कोई नजर नहीं आता क्या करूं??? चश्मा उतार कर संपादक जी आंखें पोछते हैं और तालियों की गडग़ड़ाहट केसाथ भाषण खत्म हो जाता है। मुझ बदतमीज को जाने क्यों दोस्त का चुटकुले वाला वह एसएमएस याद आ जाता है- गांधी जी हत्या हो गई, नेहरू-पटेल नहीं रहे, मेरी भी तबीयत खराब चल रही है। हे राम! इस देश का क्या होगा?
मीडिया-यथार्थ
5 फ़रवरी 2010
मीडिया का ये 'जी-फैक्टर '
गहराई से देखें तो इन सवालों का जवाब खुद सवालों में ही छिपा नजर आता है। गौर करने वाली बात यह है कि संवाददाताओं में यह प्रवृत्ति पिछले एक दशक के कुछ वर्षों से ही देखने को मिल रही है। यानि भाजपा के केंद्रीय सत्ता में आने के बाद से। इससे पहले वही अटल-आडवाणी थे, मीडिया वही था, पर खबरों में 'जी' शब्द सुनाई नहीं देता था। जाहिर है यह 'कमाल' कहीं न कहीं भाजपा के हाथ सत्ता आने के साथ जुड़ा हुआ है। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि भाजपा के सत्तासीन होने का यह दशक मीडिया के लिए भी तेजी से विस्तार का दशक था। साथ ही साथ चाल-चरित्र और दिशा के लिहाज से उसके लिए यह एक संक्रमण-काल भी था। 'चैनल क्रांति' के इन वर्षों में एक के बाद एक न्यूज चैनलों की झड़ी लग गई। जाहिर है, इन चैनलों को चलाने के लिए बड़ी संख्या में पत्रकारों की जरूरत पड़ी। इस बहती गंगा में नहाने का सबसे ज्यादा 'पुण्य' मिला दिल्ली के उन पत्रकारों को जो सियासी गलियारों में टहलते फिरते थे। वर्षों से उनके लिए आसानी से उपलब्ध रहे कई भाजपा नेताओं के सिरों पर अब लाल बत्ती की आभा चमक रही थी। नेताओं के इस 'अपग्रेडेशन' का लाभ उनसे 'जुड़े' पत्रकारों को मिला चैनलों में भारी-भरकम पैकेज वाली नौकरियों के रूप में। पत्रकारिता में 'जी-फैक्टर' का प्रवेश इसी रास्ते हुआ जान पड़ता है। अचानक से चार-चार गुनी तन्ख्वाह पाने वाले पत्रकारों की 'उपकृत और चमत्कृत' यह जमात नेताजी के एहसान का बोझ ढो रही थी। उन नेताओं के 'सिफारिशी-उपकार' का बोझ, जिनके लिए अटल 'अटल जी' और आडवाणी 'आडवाणी जी' थे। नए-नए 'अपग्रेडेशन' के चलते यह नेता और पत्रकार दोनों थोड़े कच्चे साबित हुए। न तो भाजपा को अभी कांगे्रस की तरह 'सोफेस्टिकेटेड' ढंग से मीडिया को मैनेज करना आया था, न यह पत्रकार पूरी तरह से 'हाईफाई और टैक्टफुलÓ हो सके थे। आपसी बातचीत में दोनों ही 'अटल जी-आडवाणी जी' संबोधनों का इस्तेमाल करते थे। उनका यह कच्चापन (पेशे के लिहाज 'फूहड़पनÓ कहना ज्यादा उपयुक्त होगा) ही खबरों के पीटीसी, वाइस ओवर, और फोनो आदि में 'अटल जी-आडवाणी जी' के रूप में फूट पड़ता था।
यह तो रही संवाददाताओं के स्तर पर चूक की बात, पर बात यहीं खत्म नहीं होती, क्योंकि संवाददाता तो बाइट की पहली कड़ी होता है, आखिरी नहीं। उसके किए को धोने-पछारने का काम डेस्क का होता है। 'जी' अगर अनुचित और आपत्तिजनक था तो डेस्क के स्तर पर इसे काटा-छांटा जा सकता था और संवाददाता को आगे से इसका इस्तेमाल न करने की नसीहत दी जा सकती थी, पर ऐसा नहीं हुआ। बाइटें जी-फैक्टर के साथ चलती रहीं। चैनलों के आउटपुट हेड और संपादक जैसे कर्ताधर्ता और नीति-नियंताओं को भी इस भटकाव से दोषमुक्त नहीं रखा जा सकता (दुआ साहब खुद भी इसी कैटेगरी में आते हैं)। 'अटल जी-आडवाणी जी' का जाप करने वाले संवाददाताओं की क्लास लेने का अधिकार इनके पास हमेशा की तरह सुरक्षित था। इसके बावजूद अगर इन्होंने कुछ नहीं किया जो इसमें इनकी भी मौन सहमति क्यों न मानी जाए? जाहिर है, 'मीडिया-उदय' के इस कालखंड में मीडिया-क्षितिज के तारों-सितारों रोशनी ही धूमिल नहीं हुई, बल्कि उसे 'प्रकाशित' करने वाले करने वाले 'सूरज-चंदा' भी ग्रहण की चपेट में अपना तेज खो रहे थे।
बहरहाल, अटल जी-आडवाणी जी का युग तो गुजर गया, पर इस मुद्दे की जड़ से जुड़ा सवाल अब भी अपनी जगह कायम है। सवाल है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में होने वाली जुगाड़ू भर्तियों का। आज भी मीडिया (खासकर चैनलों) में अधिसंख्य नियुक्तियां जुगाड़, सिफारिश और रसूख के सास्ते ही हो रही हैं। आज केदौर में सड़कों पर घूमने-टहलने और आसानी से किसी से भी मिल लेने वाले (एसपी सिंह सरीखे) संपादक चैनलों में लेंस, दूरबीन या माइक्रोस्कोप लेकर ढूंढने से नहीं मिलते। सूट-टाई में सजे-धजे संपादक की एसी गाड़ी से उतरते हैं और दायें-बायें देखे बिना सीधे केबिन में जाकर रिवॉल्विंग चेयर पर आसीन हो जाते हैं। उनसे मिलने की राह अब सड़कों नहीं, सत्ता के गलियारों से ही गुजरती है। स्वाभाविक है मीडिया में जब दाखिला जमीन के बजाए आकाश के रास्ते होगा तो चरित्र और संस्कारों में ऐसे ही बदलाव आते दिखेंगे ही। इसलिए शिखर पर बैठे लोगों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह इस तरह महज 'मासूम सवाल' उठाने और बौद्धिक चर्चा करने के बजाय इस विकृति के खिलाफ जमीनी तौर पर कुछ करें और जमीन से जुड़े लोगों को मीडिया से जोड़ें। बातें थोड़ी तल्ख और 'छोटा मुंह-बड़ी बात' सरीखी लग सकती हैं, पर सेमिनारों-संगोष्ठिïयों में पत्रकारिता की दशा-दिशा पर दिमागी जुगाली करने वाले मीडिया मु$गल खुद बताएं कि क्या यह सच नहीं और क्या इसके खिलाफ व्यक्तिगत रूप से और प्रभावी ढंग से उन्होंने कभी कुछ करने की कोशिश की है?
एक बड़ा व्यावहारिक सा सवाल है कि क्या आज की तारीख में ऐसा संभव है कि बिना किसी परिचय या रेफरेंस के कोई पत्रकार किसी चैनल में नौकरी के लिए जाए और प्रणव राय, विनोद दुआ, प्रभु चावला, आषुतोश, अलका सक्सेना या अनुराधा प्रसाद सरीखी संपादकीय हस्तियों से उसे मुलाकात भर करने को मिल जाए? मीडिया के 'सिस्टमÓ से अच्छी तरह वाकिफ होने के नाते मैंने तो कभी ऐसी 'नादानी' नहीं की, पर बहुतों के अनुभव सुन रखे हैं। कई लोगों ने बताया कि बायोडाटा लेकर नौकरी के लिए जाने पर पागलखाने से छूटकर आए प्राणी की तरह एक भीतरी व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ देखा जाता है और 'कहां-कहां से चले आते हैं' के भाव के साथ रिसेप्शनिस्ट के पास ही बायोडाटा धरवा कर रफा-दफा कर दिया जाता है। 'नंबर वन' का दावा करने वाले चैनलों के बारे में तो सुना है कि गेट पर ही पर ही बायोडाटा 'डंप' करने के लिए बॉक्स रखा रहता है। बायोडाटा डालिए और 'कर्म किए जा, फल की इच्छा मत कर' के भाव से निकल लीजिए। कुछ पूछने की जुरर्रत अगर कर भी ली तो चिड़चिड़ाते लहजे में महज एक लाइन का जवाब सुनने को मिलेगा कि सीवी में फोन नंबर और ई-मेल आईडी दिया है न? जब जरूरत होगी बता दिया जाएगा। चेहरे की भाव-भंगिमा ऐसी तिरस्कार भरी होगी कि 'संसार माया है, क्या लेकर जाएगा-क्या लेकर आया है' का गूढ़ ज्ञान एक झटके में मिल जाता है। बायोडाटा लेकर भीतर गया 'सिद्धार्थ' मिनट भर में 'बुद्ध' बनकर बाहर निकल आता है, 'माया' के इस दलदल में दोबारा कदम न रखने के संकल्प के साथ। बातें अतिरंजनापूर्ण लग रही हों तो नेट खंगाल लीजिए। मीडिया केमारों के बहुत ब्लॉगों पर ऐसी आपबीतीयां पढऩे को मिल जाएंगी। मीडिया जगत में यह बात वर्षों से एक 'अंडर करेंट' की तरह दौड़ रही है। जानता हर कोई है, पर इसके खिलाफ कहता-बोलता और करता कोई कुछ नहीं। मीडिया लोक के 'देवगण' भी पत्रकारिता के मूल्यों में गिरावट पर महज 'प्रवचन' देकर 'दायित्व-निर्वाह' कर लेते हैं। कुछ उसी अंदाज में जैसे कथा बांचने से पहले पंडित जी सबपर गंगाजल छिड़क कर ओम पवित्रम-पवित्रम बुदबुदाते हैं और यह मानते हुए कि सब लोग पवित्र हो गये, कथा शुरू हो जाती है। इसी परिपाटी पर मीडिया-कथा चल रही है। इस कथा वाचन से हटकर हकीकत के धरातल पर कुछ नहीं होता।
आज देश में आईएएस-पीसीएस तो छोडि़ए ड्राइवर-कंडक्टर, क्लर्क और यहां तक कि चपरासी तक बनने के लिए परीक्षा और साक्षात्कार देना पड़ता है, पर पत्रकार बनने के लिए कोई परीक्षा-परीक्षण नहीं होता। रस्म अदायगी के लिए कुछ मिनटों का साक्षात्कार होता है। इस साक्षात्कार की भी क्या कहें! अकसर साक्षात्कार कम, 'बौद्धिक बलात्कार' ज्यादा होता है। कहां से आए हो, वहां कितना (पैसा) मिलता था, क्या देखते थे जैसे दो-चार औपचारिक प्रश्नों के बाद शुरू हो जाती है संपादक जी की अपनी गौरव-गाथा। प्रत्याशी की योग्यता और ज्ञान परखने के बजाए संपादक जी अपनी ही महानता और ज्ञान बघारने में जुट जाते हैं। नौकरी चाहिए तो सुनते रहिए 'कथा शुरू है बलिदानों की, आये मजा कहानी में' के भाव के साथ। वाजपेयी जी की कविता 'चेहरे पर मुस्काने चिपकाये, खुद में ही रोता हूं' मन ही मन गुनिये, मुस्कराइये और श्रद्धापूर्वक पूरा का पूरा 'कथामृत' गटक जाइये। चेहरे पर जितनी श्रद्धा, जितनी हां में हां, उतनी ज्यादा पगार। अपना दिमाग दिखाने की कोशिश कर जरा भी डिस्टर्बेंस क्रिएट किया तो सरकार बुरा मान जाएंगे। ...और फिर तो अरस्तू, सुकरात, आइंस्टाइन क्या उनके बाप भी आ जाएं, संपादक जी घेरकर गिरा ही लेंगे कहीं न कहीं। सवालों की ऐसी झड़ी लगेगी, जिनके जवाब खुद उनको भी ठीक-ठीक नहीं मालूम होंगे। लोकल रिपोर्टिंग के लिए आए हो तो पूछेंगे टिंबकटू कहां है? बुर्कीनाफासो के हालात पर आपका क्या कहना है आपका? मुक्तिबोध की कविताओं में संवेदनाओं की अभिव्यक्ति के लिए प्रयुक्त प्रतीकों पर कुछ प्रकाश डालिए। टार्च तो ले नहीं गए हो, प्रकाश कहां से डालोगे भइया! इसलिए इंटरव्यू में मुस्कुराते हुए 'संपादक-पुराण' सुनो, हां जी-हां जी करो और नौकरी का 'प्रसाद' लेकर बाहर आ जाओ (ज्ञान-वान मत दिखाना, संपादक जी गुस्से हो जाते हैं)। इंटरव्यू के दौरान भी अकसर संपादक जी जल्दी में दिखाई देते हैं। आधे घंटे बाद यूनिवर्सिटी के सेमिनार में जाना है 'मीडिया की गिरती गरिमा : कारण और उपचार' पर व्याख्यान देने। तालियों के बीच मंच पर पहुंचते चालू हो जाते हैं...मीडिया की साख गिर रही है, काबिल और गंभीर लोग पत्रकारिता में नहीं आ रहे हैं, पत्रकारों की तो पढऩे-लिखने में कोई रुचि ही नहीं रह गई है आज...। आधे घंटे पकाने के बाद भावुक होकर कहते हैं मेरी भी उम्र होती जा रही है, चाहता हूं किसी किसी योग्य उत्तराधिकारी को दायित्व सौंप कर किनारे हो लूं। पांच साल से तलाश रहा हूं, कोई नजर नहीं आता क्या करूं??? चश्मा उतार कर संपादक जी आंखें पोछते हैं और तालियों की गडग़ड़ाहट केसाथ भाषण खत्म हो जाता है। मुझ बदतमीज को जाने क्यों दोस्त का चुटकुले वाला वह एसएमएस याद आ जाता है- गांधी जी हत्या हो गई, नेहरू-पटेल नहीं रहे, मेरी भी तबीयत खराब चल रही है। हे राम! इस देश का क्या होगा?
20 जनवरी 2010
महंगाई पर तमाशेबाजी!
27 सितंबर 2009
तो ऐसे होती है दिल्ली में क्रांति, कमाल है!
25 सितंबर 2009
दरोगा जी में जाग उठी ’ देवी ’
20 सितंबर 2009
दाती गुरु का मंतर काम कर रहा है
मदारी की बाजीगरी दिल बहलाती है। लोग सिक्के फेकते हैं। मीडिया की बाजीगरी इससे कहीं गहरी है। व्यापकतर असर रखती है। चैनलों का चलाया दाती गरु का मंतर आजकल दिल्ली में खूब कमाल दिखा रहा है। दाती गुरु वही रजत शर्मा मार्का। इंडिया टीवी वाले। बाद में शायद अच्छा आफर मिला तो न्यूज-24 चले गए। आजकल वहीं से भक्तों को दीक्षा दे रहे हैं। भविष्य बांच रहे हैं। पहले शनि के प्रकोप से बचाते थे। दाती गुरू के मुख से चैनलों ने शनिदेव की महिमा ऐसी बखानी कि उनका अपना टीआरपी तो बढा ही, शनिदेव के भी दिन फिर गए। जरा दिल्ली की सैर कीजिए इनके मंतर का असर दिल्ली के दिल कनाट प्लेस तक पर नजर आएगा। मेटरो गेट, बस स्टाप, पालिका, फुटपाथ हर जगह शनि महाराज विराजे दिखाई देंगे। लोग खामखां डरते हैं इनसे इतना। जाने क्यों एक गुस्सैल सी विलेन टाइप इमेज बना रखी है बेचारे शनिदेव की। जरा गौर से देखिए चश्मा उतार कर। इनसे सीधा और लाचार कोई नजर नहीं आएगा आपको दिल्ली में। लाचार इसलिए की बिना कुछ चूं-चपड़ किए घंटों धूप में झुलस रहे हैं। सीधा इसलिए कि इनको साधना किसी भी दूसरे देवता को साधने से आसान हो गया है आजकल। न मूर्ति का खर्चा, न फोटो का, चैकी सजाने जैसी लग्जरी की तो बात ही छोड़िए। बस एक गत्ते पर फटा-पुराना-मैला-कुचैला जैसा भी मिल जाए एक काला कपड़ा ओढ़ा कर एक फूल माला चढ़ा दीजिए। सामने एक छोटे से बर्तन में तेल रख दीजिए। हो गया काम। अब देखिए शनि देव का कमाल। कुछ चमत्कार नहीं दिखा क्या! कैसे दिखेगा यार, दो-चार चिल्लर-विल्लर नहीं डालोगे जबतक अपनी तरफ से। भई अब इतना इंवेसमेंट तो करना ही पड़ेगा कोई भी नया धंधा जमाने में। तो एक, दो पांच के दो चार सिक्के डाल के परे हट लो। अब देखो शनिदेव कैसे फटाफट कमाई कर भरते हैं तुम्हारी जेब। दो-दो घंटे पर आकर रिटर्न कलेक्ट करते जाओ बस। हाथ-पांव डोलाने की कोई जरूरत नहीं, मगजमारी भी कुछ नहीं। एक दिन में एक का पंद्रह बटोरो। वो कहते हैं न, कि अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम; दास मलूका कह गए सबके दाता राम। मलुक दास ससुर बुडबक थे, जो शनि देव के एकाउंट का श्रेय राम के खाते डाल गए। शायद उनकी इसी गलती को सुधारने के लिए कलयुग में दाती गुरु का अवतार हुआ और रजत शर्मा उनके प्रमोटर बने। वर्ना इतना मंदी के इस दौर में इतने कम इंवेसमेंट में ऐसा चोखा धंधा कौन माई का लाल क्या खा के जमा लेता। शनिदेव भी शनीचर बने कहीं कोने में बैठे होते ललिता पवार जैसा मुंह बनाए। तो ’ हल्दी लगे न फिटकरी रंग भी चोखा आए ’ के इस कमाल को देखो। श्रद्धा उमड़े तो रुपया-दो रुपया चढ़ा दो, अपनी औकात देख कर। और जोर से बालो शनि देव की जय ! दाती गुरु की जय !! चैनल वालों की !!!
19 सितंबर 2009
दाती गुरु का मंतर काम कर रहा है
14 सितंबर 2009
समाचार वालों पीछे से निकल लो
दिल्ली की बसों नगर बसों में सफर करना यूं तो अपने आप में एक यातना है, पर इस यातना में एक मजा भी कहीं छिपा हुआ है। यह मजा है कंडेक्टरों की बोली और चुहलबाजी का। कभी-कभी सोचता हूं कि जाने कब नजर पडे़गी ललित कला अकादमी वालों की, इन कलाकारों की कलाकारी पर। हर स्टाॅप पर खिड़की से सिर निकाल कर सवारियों को रिझा कर अपनी बस में चढ़ाने के लिए तरह-तरह के खटकर्म करते हैं बेचारे। पूरी सुर-लय-ताल में स्टेशनों के नाम एक सांस में ले जाते हैं बेचारे। इसमें भी मिनट-मिनट पर जुगलबंदी हो जाती है। एक सांस में जो जितने ज्यादा स्टाॅपेजों के नाम लेता है वही चैंपियन। जगहों के इन आड़े-तिरछे नामों को एक लय में लपेट कर झट से उगल देना वाकई आसान नहीं। यकीन न आए तो कभी आजमा कर देख लीजिए अकेले में। कलापक्ष के बाद बात करें इनकी चुहलबाजी की तो वह भी लाजवाब है जनाब। स्टाॅपेज के पास धीमी होती बस की तरफ कोई महिला बढ़ती दिख जाए तो कंडक्टर माहाशय चिल्लाएंगे- लेडीज सवारी है आगे से ले लो। इसके विपरीत आदमी आता दिखे तो उसका डाॅयलाॅग होगा- जेंड सवारी है पीछे से लो। आगे से लो और पीछे से लो का औपचारिक मतलब तो बस के अगले गेट और पिछले गेट से होता है पर अनौपचारिक और असली मतलब क्या होता है, समझने वाले खूब समझते हैं।नोएडा के गोल चक्कर स्टाॅप पर लंबा-चैडा भीमकाय सा आदमी सडक किनारे खडा दिखा। कंडक्टर उसे देखकर चिल्लाने लगा चिड़ियाघर-चिड़ियाघर-चिड़ियाघर, जबकि इससे पहले उसने किसी स्टाॅप पर चिडियाघर का नाम नहीं लिया। चंद कदम बाद एक मोटा आदमी दिख गया तो चिल्ला पड़ा अप्पूघर-अप्पूघर-अप्पूघर। सब जानते थे कि ये बस अप्पूघर नहीं जाती, लिहाजा बस में ठहाका गूंज उठा। इसी तरह सड़क पर कुछ इठला-बलखा कर कुछ अजीब अंदाज में चलती लड़की को देख दिलफेक कंडक्टर बोला पागलखाने-पागलखाने-पागलखाने। जी हां कोई पागलखाना बस के रूट पर न होने पर भी। कंडक्टर की ये बदमाशियां यात्रियों को भी भरपूर मजा दे रही थीं। थोड़ी देर बाद एक स्टाॅपेज पर उसने कुछ ऐसी बात कही जिसमें आज के दौर की एक बहुत बड़ी सच्चाई और गहरा व्यंग्य छुपा हुआ था। इस व्यंग्य का भान उसे कत्तई नहीं, था पर एक पत्रकार होने के नाते मुझे इसका अहसास हुआ। दरअसल नोएडा से दिल्ली के रास्ते में एक रिहायशी बिल्डिंग पड़ती है समाचार अपार्टमेंट। इसके नजदीक आते ही वह चिल्ला पड़ समाचार वालों दरवाजा पकड़ लो-समाचार वालों दरवाजा पकड़ लो। उसका मतजब उस स्टाॅपेज पर उतरने वालों के उठ कर दरवाजे की ओर बढ़ने से था। बिल्डिंग और नजदीक आई तो उसका डाॅयलाॅग थोड़ा बदल गया- समाचार वालों पिछले गेट से निकल लो-पिछले गेट से निकल लो। उसकी बात ने जब मेरे दिमाग में क्लिक किया तो मैंने सोचा कि वाकई जाने-अनजाने ये अनपढ़ सा आदमी मीडिया जगत की कितनी बड़ी सच्चाई बयां कर रहा है। आज अखबारों और खासकर टीवी चैनलों को देखिए तो जरा। अखबार के नाम पर चल रहे इस ’ कारोबार ’ में समाचार वाकई दरवाजा पकड़ता जा रहा है। समाचार की जगह न्यूज बुलेटिन में ’आइटम’ परोसे जा रहे हैं। और तथ्य ही सर्वोच्च है, सर्वप्रथम है का एथिक्स पढ़कर पत्रकारिता में आने वाले लोग वाकई पिछले दरवाजे से बाहर किए जा रहे हैं। बिना किसी हो-हल्ले और शोर-शराबे के। उनकी जगह बिठाए जा रहे हैं अनुप्रास में डूबी हेडिंग लगाने वाले और फिल्मी डाॅयलाॅग की अंदाज में स्टोरी की काॅपियां लिखने वाले पत्रकारिता के नए कर्णधार। स्क्रीन पर भी अब दांत पीस-पीस कर और ओंठ चबा-चबा कर वीर और वीभत्स रस में, पूरे नाटकीय अंदाज में डाॅयलाग डिलिवरी करने वालों को ही जगह मिल रही है। गंभीर चेहरे और अंदाज वाले पत्रकार लगता है मीडिया की बस के पिछले दरवाजे से पड़ाव-दर-पड़ाव उतरते जा रहे हैं। एक-एक कर खत्म होता जा रहा है उनका सफर।
24 जून 2009
मायने बदल गए
समझता है आदमी
तभी तो बदल लेता है,
खुद को समय के साथ
अपना पूरा किरदार
और बदल डालता है साथ में
सोच, फितरत, स्वभाव सबकुछ।
बदलावों के इस बवंडर में,
फंस कर बदल जाते हैं
लफ्जों के मायने भी
शब्द वही रहते हैं
शब्दकोश वही रहते हैं
बदल जाते हैं तो बस
लफ्जों के मायने
लड़ना बुराई से
देना सच का साथ
कहलाता था साहस कभी
पर बदल गए हैं पूरी तरह
साहस के मायने आज
चोर को चोर कहना
दलाल को दलाल कहना
और कहना दोगले को दोगला
‘साहस’ से भी बढ़कर
आज हो चला है ‘पराक्रम’
और यह भी सच है समाज का
कि हर आदमी हो नहीं सकता पराक्रमी
इस लिए उसने खोज निकाला है रास्ता
रास्ता ‘शालीनता’ की चादर ओढ़
बन जाने का ‘सुसभ्य’ और ‘लोकतांत्रिक’
- - -तो अब सभ्य, शालीन और लोकतांत्रिक
आदमी के मुंह से लिकलेंगे भला कैसे
दोगला, चोर, दलाल जैसे सस्ते शब्द
इस लिए गढ़ लिया गया है
एक ‘सुसभ्य’ सा नया संबोधन
चोर-दलाल-दोगले सबको
समेट लिया है बस एक लफ्ज में
क्या है बोलो वह शब्द !
ठीक कहा, ‘माननीय’ ।
21 जून 2009
तो इस लिए है सुअर घिनौना ।
यह तो हुई समस्या की वैज्ञानिक व्याख्या । इसके अलावा सुअर का मीट खाना मना होने का एक नैतिक कारण भी किताब में बताया गया है । वह कारण यह है कि सुअर ही एक ऐसा प्राणी है जो अपने साथियों को अपनी संगिनी के साथ संभोग करने के लिए स्वयं आमंत्रित करता है, बाकी कोई भी जीव ऐसा काम नहीं करता । यह दूसरा कारण मेरे लिए एक नई जानकारी थी । अगर यह हकीकत है तो इसके कारणों आदि पर व्यापक वैज्ञानिक की शोध की जरूरत है । शायद इसी कारण से सुअर को घिनौनेपन की मिसाल माना जाता है ।
19 जून 2009
दिमाग की खिड़कियां खोलो अविनाश !
अविनाश की पोस्ट में कहा गया कि हमें मोहल्ले में सलीम साहब की सोहबत नहीं चाहिए - - - क्योंकि उनका उद्देश्य इस्लाम का प्रचार करना है - - - । यहां दो बातों पर मैं खास ध्यान दिलाना चाहूंगा । पहला है ‘सोहबत’ शब्द । बहुत महत्वपूर्ण शब्द है सोहबत, जिसे हिन्दी में सानिध्य या संगत कहते हैं । इसी संगत को लेकर कहावत है कि ‘संगत से गुण आत है, संगत से गुण जाए’ ।
‘सलीम साहब की सोहबत नहीं चाहिए’ का मतलब है उनकी सोहबत खराब है या बिगाड़ने वाली है । क्यों बिगाड़ने वाली है, क्यों कि वह इस्लाम की बात करते हैं । ब्लाग के मेजबान ‘परम विद्वान’ अविनाश जी की सोहबत बड़ी भली है क्योंकि वह इसी ब्लाग पर कविता छाप रहे हैं कि ‘हमारे देवताओं को जननेन्द्री नहीं होती’ । लोगों के ज्ञान के साथ-साथ बड़ी सामाजिक समरसता बढ़ा रहे हैं अविनाश और सलीम इस्लाम के बारे में कुछ बता रहे हैं तो गुनाह कर रहे हैं । इस लिए मोहल्ले को उनकी सोहबत नहीं चाहिए, उन्हें बेदखल किया जाता है । उनके सभी लेखों को हटा दिया गया, उनका आईडी तक ब्लाक कर दिया गया जिसे बहाल करने की सलीम बार-बार गुजारिश कर रहे हैं । खुद मोहल्ला के कुछ टिप्पणीकार भी इस एक तरफा फैसले पर ऐतराज जता चुके हैं , पर अविनाश के कान पर जूं नहीं रेंग रही, क्योंकि वो इस मोहल्ले के ‘दादा’ हैं, दादागिरी चलती है उनकी यहां । जिसे चाहें रखें, जिसे चाहें तड़ीपार कर दें । अरे यार ! जरा दिमाग का दरवाजा खोलो, खिड़कियां खोलो । क्या समझते हो खुद को । क्या दिखाना चाहते हो यह सब करके कि कार्ल माक्र्स के बाद इस धरती पर तुम ही बचे हो महान । माक्र्स ने धर्म अफीम है, कह कर खुद को धर्म-कर्म के बंधन से उपर साबित किया था और माक्र्स के बाद अब तुम खुद को साबित कर रहे हो देवताओं को जननेन्द्री नहीं होती कह कर, मजहब की बात करने वाले सलीम को बेदखल करके । क्या समझते हो खुद को, किस ख्वामख्याली में जी रहे हो भाई ।
गौरतलब है कि सलीम को बेदखल करते वक्त कारण महज यह बताया गया कि उनका उद्देश्य इस्लाम का प्रचार करना है । यह नहीं कहा गया कि वह कोई आपत्तिजनक बातें कह रहे हैं या उनकी फलां-फलां बातें आपत्तिजनक हैं । अरे यार ! जननेन्द्री वाली कविताओं को छोड़ कर कभी-कभी कुछ और भी पढ़ लिया करो । सदियों पहलने रहीम कह गए थे कि -
कह रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग
चंदन विष व्यापत नहीं, लपटे रहत भुजंग ।
जरा इस दोहे से भी तो कुछ सीख लो सीख लो । जो धर्म की मजहब की बात कर रहा है, करने दो । तुम अपनी बात करो । जिसे उसकी पढ़नी होगी, उसकी पढ़ेगा । जिसे तुम्हारी पढ़नी है, तुम्हारी पढ़ेगा । क्या दिक्कत है इसमें । कुछ आपत्तिजनक बात करता है कोई, तो बेशक हटा दो उसका उल्लेख करते हुए, पूरा अधिकार है ब्लाग के मेजबान को, पर बेअदबी और मनमानी तो ठीक नहीं । सलीम कोई ओसामा बिन लादेन का यशोगान तो नहीं कर रहे थे, न ही इस्लाम के नाम पर अमेरिका पर एक और हमला करने का आह्वान कर रहे थे । चीजों की अपने धर्म के अनुसार व्याख्या कर रहे थे । अपने धर्म को युक्तिसंगत और महान बता रहे थे । वह तो हर कोई करता है । हिन्दू भी करता है, ईसाई भी करता है । तो महज इस्लाम के प्रचार का आरोप लगाकर किसी को निकालना उचित है क्या !
जरा अपने ब्लाग के नाम पर भी गौर करो भइया ! मोहल्ला । भई जहां तक हमने देखा है मोहल्ले में हर किस्म के, हर मजहब को मानने वाले लोग अपने-अपने तरीके से रहते हैं। मोहल्ले में मंदिर भी होता है, मस्जिद भी होती है । मंदिर में आरती-भजन, तो मस्जिद में अजान और नमाज होती है । तो अविनाश का यह कैसा मोहल्ला है जहां अजान की इजाजत नहीं । और क्यों नहीं ! जरा इसपर भी ठंडे दिमाग से गौर करो । अब बातें तो बहुत सी हैं, पर बात निकलेगी तो बहुत दूर तलक जाएगी। इसलिए फिलहाल इतना ही । इस गुजारिश के साथ कि यह सबकुछ किसी को नीचा दिखाने या कोरी आलोचना के लिए नहीं लिख रहा । महज चीजों को एक होलिस्टिक एप्रोच में, खुले दिमाग से देखने के लिए कह रहा हूं । इसके अलावा मेरी इस पोस्ट का कोई और मकसद न है, न समझा जाए ।
18 जून 2009
इस ‘सिरफुटव्वल’ का भी अपना ही मजा है
भाई समय जी ! आपने सीधे-सीधे शब्दों में क्षमा याचना कर जहां अपने बड़प्पन का परिचय दिया है, वहीं कहीं न कहीं मुझ में भी एक शर्मिंदगी के अहसास को उभारा है क्योंकि मैंने इस उद्देश्य से यह पोस्ट कत्तई नहीं लिखा था कि कोई मुझसे खेद प्रकट करे। न ही कोई व्यक्तिगत पीड़ा की बात थी । इसीलिए चोर शब्द का इस्तेमाल भी मैंने इनवर्टेड क्वामाज़ में विशेष अर्थों में ही किया था । मैंने तो दोनों ही टिप्पणीकारों को न कोई दोष दिया, उनके नाम का जिक्र तक नहीं किया था किया । महज इसलिए कि न तो मैं बात को व्यक्तिगत स्तर पर ले रहा था, न अपनी ओर से ले जाना चाहता था । उल्टे मैंने शुक्रिया अदा किया कि आपकी टिप्पणी के बहाने मेरी शुरू की बहस कहीं न कहीं आगे बढ़ी है । आपका कहना है कि आप का भी यही उद्देश्य था टिप्पणी के पीछे तो फिर ऐसे में हममे-आपमें कहां कोई विभेद या विरोध रह जाता है । अंतर केवल दृष्टिकोणों और समझ का है और मेरी समझ में नजरियों में यह फर्क होना अच्छी बात है । यह तो होना ही चाहिए । वर्ना हर आदमी एक ही लाइन पर सोचने लगे, एक ही राग गाने लगेगा तो विविधता और विचारों की नवीनता भला कहां रह जाएगी ।
मुझे व्यक्तिगत ठेस की ग्लानि आप अपने मन से निकाल दें क्योंकि मैं भी जानता हूं ऐसा उद्देश्य आपका नहीं रहा होगा । मैंने केवल इस बात पर आपत्ति जताई थी कि ‘पुरस्कार होंगे तो तिकड़में तो होंगी ही’ क्योंकि इस वाक्य से कहीं न कहीं इन तिकड़मों को स्वीकृति मिलती सी लग रही थी कि यह होगा तो वह तो होगा ही । हालांकि आपने इसकी व्याख्या मनुष्य की महत्वाकांक्षा और स्वाभाविक प्रवृत्तियों से जोड़ते हुए कुछ अलग ढंग से की है । भाई इस प्रवृत्ति पर ही तो मैं चोट करना चाहता था, यही तो मेरा आशय था कि हिन्दी की दुनिया में पुरस्कारों की तिकड़में बहुत ज्यादा हैं इसलिए नोबेल और बुकर जैसा पुरस्कार बनाया जाए जिसकी चयन प्रक्रिया में इन सबकी इतनी गुंजाइश ही न रह जाए । हालांकि यहां मैं यह भी कहना चाहूंगा कि इन दोनों पुरस्कारों की चयन प्रक्रिया भी विवादों से पूरी तरह बरी नहीं है, पर वहां जोड़-तोड़ वैचारिक आग्रह-दुराग्रहों को लेकर ही ज्यादा होती है व्यक्तिगत आधार पर नहीं । जबकि इधर हिन्दी के पुरस्कारों में व्यक्तिगत लाबींग का काफी बोलबाला दिखता है । इसलिए मैंने यह बात कही थी ।
लेखन के उद्देश्यों की आपने जो बात की है मैंने उसका जिक्र जानबूझ कर इसलिए नहीं किया था कि यह अपने आपमें एक व्यापक बहस का विषय है । आपने लेखन का उद्देश्य स्वांतःसुखाय और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की अभिलाषा से परे होने की बात कही है, इससे मैं भी सौ फीसदी सहमत हूं कि आदर्श स्थिति तो यही है, बस थोड़ा अलग मैं यह कहता हूं कि यदि आदमी सम्मान की अभिलाषा में भी कुछ अच्छा लिख रहा है तो वह कोई अपराध नहीं कर रहा क्योंकि सम्मान की प्यास और लोगों के ध्यानाकर्षण की प्रवृत्ति मनुष्य के मूल स्वभाव में है । खैर ! जैसाकि मैंने कहाकि यह अपने आप में एक अलहदा और लंबी बहस है, फिर कभी । अंत में बस इतना ही कि आपको माफी मांगने या आत्मग्लानि की कोई आवश्यकता नहीं, उल्टे बहस को आगे बढ़ाने के लिए साधुवाद । जारी रखें ऐसा ही सार्थक संवाद क्योंकि ऐसे सवालों पर हम-आप जैसे लोग सिर टकराएंगे तभी तो यह मुद्दे उठेंगे, आकार लेंगे । इसलिए आओ प्यारे सिर टकराएं !
इस ‘सिरफुटव्वल’ का भी अपना ही मजा है
भाई समय जी ! आपने सीधे-सीधे शब्दों में क्षमा याचना कर जहां अपने बड़प्पन का परिचय दिया है, वहीं कहीं न कहीं मुझ में भी एक शर्मिंदगी के अहसास को उभारा है क्योंकि मैंने इस उद्देश्य से यह पोस्ट कत्तई नहीं लिखा था कि कोई मुझसे खेद प्रकट करे। न ही कोई व्यक्तिगत पीड़ा की बात थी । इसीलिए चोर शब्द का इस्तेमाल भी मैंने इनवर्टेड क्वामाज़ में विशेष अर्थों में ही किया था । मैंने तो दोनों ही टिप्पणीकारों को न कोई दोष दिया, उनके नाम का जिक्र तक नहीं किया था किया । महज इसलिए कि न तो मैं बात को व्यक्तिगत स्तर पर ले रहा था, न अपनी ओर से ले जाना चाहता था । उल्टे मैंने शुक्रिया अदा किया कि आपकी टिप्पणी के बहाने मेरी शुरू की बहस कहीं न कहीं आगे बढ़ी है । आपका कहना है कि आप का भी यही उद्देश्य था टिप्पणी के पीछे तो फिर ऐसे में हममे-आपमें कहां कोई विभेद या विरोध रह जाता है । अंतर केवल दृष्टिकोणों और समझ का है और मेरी समझ में नजरियों में यह फर्क होना अच्छी बात है । यह तो होना ही चाहिए । वर्ना हर आदमी एक ही लाइन पर सोचने लगे, एक ही राग गाने लगेगा तो विविधता और विचारों की नवीनता भला कहां रह जाएगी ।
मुझे व्यक्तिगत ठेस की ग्लानि आप अपने मन से निकाल दें क्योंकि मैं भी जानता हूं ऐसा उद्देश्य आपका नहीं रहा होगा । मैंने केवल इस बात पर आपत्ति जताई थी कि ‘पुरस्कार होंगे तो तिकड़में तो होंगी ही’ क्योंकि इस वाक्य से कहीं न कहीं इन तिकड़मों को स्वीकृति मिलती सी लग रही थी कि यह होगा तो वह तो होगा ही । हालांकि आपने इसकी व्याख्या मनुष्य की महत्वाकांक्षा और स्वाभाविक प्रवृत्तियों से जोड़ते हुए कुछ अलग ढंग से की है । भाई इस प्रवृत्ति पर ही तो मैं चोट करना चाहता था, यही तो मेरा आशय था कि हिन्दी की दुनिया में पुरस्कारों की तिकड़में बहुत ज्यादा हैं इसलिए नोबेल और बुकर जैसा पुरस्कार बनाया जाए जिसकी चयन प्रक्रिया में इन सबकी इतनी गुंजाइश ही न रह जाए । हालांकि यहां मैं यह भी कहना चाहूंगा कि इन दोनों पुरस्कारों की चयन प्रक्रिया भी विवादों से पूरी तरह बरी नहीं है, पर वहां जोड़-तोड़ वैचारिक आग्रह-दुराग्रहों को लेकर ही ज्यादा होती है व्यक्तिगत आधार पर नहीं । जबकि इधर हिन्दी के पुरस्कारों में व्यक्तिगत लाबींग का काफी बोलबाला दिखता है । इसलिए मैंने यह बात कही थी ।
लेखन के उद्देश्यों की आपने जो बात की है मैंने उसका जिक्र जानबूझ कर इसलिए नहीं किया था कि यह अपने आपमें एक व्यापक बहस का विषय है । आपने लेखन का उद्देश्य स्वांतःसुखाय और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की अभिलाषा से परे होने की बात कही है, इससे मैं भी सौ फीसदी सहमत हूं कि आदर्श स्थिति तो यही है, बस थोड़ा अलग मैं यह कहता हूं कि यदि आदमी सम्मान की अभिलाषा में भी कुछ अच्छा लिख रहा है तो वह कोई अपराध नहीं कर रहा क्योंकि सम्मान की प्यास और लोगों के ध्यानाकर्षण की प्रवृत्ति मनुष्य के मूल स्वभाव में है । खैर ! जैसाकि मैंने कहाकि यह अपने आप में एक अलहदा और लंबी बहस है, फिर कभी । अंत में बस इतना ही कि आपको माफी मांगने या आत्मग्लानि की कोई आवश्यकता नहीं, उल्टे बहस को आगे बढ़ाने के लिए साधुवाद । जारी रखें ऐसा ही सार्थक संवाद क्योंकि ऐसे सवालों पर हम-आप जैसे लोग सिर टकराएंगे तभी तो यह मुद्दे उठेंगे, आकार लेंगे । इसलिए आओ प्यारे सिर टकराएं !
17 जून 2009
मुझे ‘चोर’ कहने का शुक्रिया
शायद अपने खड़े किए इस संयम के बांध का ही यह नतीजा है कि दो महाशयों द्वारा खुद मुझे ही कठघरे में खड़ा किये जाने पर भी मैं उनसे झगड़ने के बजाय उनका शुक्रिया अदा करना चाह रहा हूं । शुक्रिया, दबे-छिपे मुझे ‘चोर’ कहने का । जो हुआ, एक तरह से ठीक ही हुआ कि दोनों साथियों के मन का गुबार भी निकल गया और मेरी बात भी आगे बढ़ गई । दरअसल अपनी इस लेखमाला में मैंने हिन्दी की दुर्दशा के व्यावहारिक कारणों की पड़ताल और चर्चा करने का प्रयास किया था । हिन्दी अखबारों, पत्रिकाओं में होने वाले ओछेपन, बड़े लेखकों की तंगदिली, से होती हुई चर्चा पहंुची थी हिन्दी में नोबेल और बुकर जैसा बड़ी इनाम राशि वाला कोई पुरस्कार न होने पर पहुंची थी। इसके अलावा मौजूदा पुरस्कारों के लिए होने वाली तिकड़मों का जिक्र भी मैने किया था ।
मेरा कहना था कि हम हिन्दी वालों को भी मिलकर एक ऐसा पुरस्कार शुरू करना चाहिए । क्योंकि पुरस्कार से जुड़ा सम्मान अपनी जगह होता है, पर उसकी धनराशि का भी अपना महत्व होता है । मैंने उदाहरण दिया था कि अपना पहला और एकमात्र उपन्यास गाड आफ स्माल थिक्स लिखकर ही अरुंधती राय को बुकर पुरस्कार में इतने पैसे मिल गए कि उन्हें कम से कम आजीविका के लिए संघर्ष करने की जरूरत नहीं और वह चाहें तो रोटी की जद्दोजहद से बेफिक्र होकर पूरी तल्लीनता से रचना कर्म में खुद को डुबो सकती हैं । अब मेरा यह सुझाव एक महाशय को न जाने क्यों इतना नागवार गुजर गया मैं आज तक समझ नहीं पाया हूं । अपनी टिप्पणी में उन्होंने लिखा है कि ‘ पुरस्कार होंगे तो तिकड़म तो होगी ही । पुरस्कारों की चर्चा करते-करते आप भी आखिरकार पुरस्कार के चक्कर में पड़ गए’ ।
अरे भइया ! कौन सा पुरस्कार मांग लिया मैंने आपसे या किसी से यह बात कह कर, जरा बताइये तो सही ! और अगर आप यह कहना चाह रहे हैं कि मैं यह सब कोई पुरस्कार पाने के लिए लिख रहा हूं तो भई जरा बताइये कि लेख की किस पंक्ति, किस शब्द से आप इस निष्कर्ष पर पहुंचे, कहां से मिला आपको यह ‘महाज्ञान’ । चलिए इसपर अपनी आपत्ति को दरकिनार करते हुए यह भी मान लिया जाए कि मैं पुरस्कार के लिए लिख रहा हूं तो इसमें कौन सा गुनाह है बड़े भाई ! आदमी अगर समाज में सम्मान चाहता है, अपने कृतित्व के जरिए तो उसे भी आप कुफ्र साबित करने पर क्यों तुले हैं । स्वाभिमान और सम्मान की यह प्यास ही तो आदमी को आदमी बनाती है । वर्ना दोपाये-चैपाये में फर्क ही क्या है हुजूर !
अब आते हैं दूसरे सज्जन की टिप्पणी पर । नाम इनका भी नहीं लूंगा क्योंकि इनसे भी कोई विरोध या वैमनस्य नहीं है मेरा, मात्र वैचारिक असहमति जताना चाहता हूं । डाक्टरेटधारी इन भाई साहब ने लिखा कि ‘बोल बाबा की जय, ये तिकड़म-तिकड़म क्या है ! जिसने पाया, उसने जाना’ । इनका कमेंट था पुरस्कारों के लिए की जाने वाली तिकड़मों पर कही गई मेरी बात पर ! पढ़कर गुस्सा बाद में आया, हंसी पहले, वह भी भरपूर । बोल बाबा की जय - - - क्या मदारीपना है यह ! जिसने पाया उसने जाना तो भई ठीक है कल को रिश्वत लेने वाला भी कह देगा कि बोल बाबा की जय जिसने पाया, उसने जाना, यह भ्रष्टाचार-वष्टाचार क्या है !
आखिरकार एकबार फिर वही बात कहना चाहूंगा कि यह पोस्ट मैं इन टिप्पणियों पर आपत्ति जताने के लिए नहीं लिख रहा हूं । यह सब तो ब्लागिंग का हिस्सा है, चलता रहता है । मेरा ऐतराज इस बात को मान्यता देने से है कि पुरस्कार होंगे तो तिकड़म तो होगी ही । अरे भाई पुरस्कारों को प्रतिभा से जोड़िये, सृजनात्मकता से जोड़िये, विचारों की नवीनता से जोड़िये । तिकड़म से क्यों उसका ‘नैसर्गिक संबंध’ स्थापित कर रहे हैं । इसके अलावा पुरस्कारों के लिए होने वाली तिकड़म को यह कह कर दरकिनार कर देना कि यह तिकड़म-विकड़म क्या है, जिसने पाया, उसने जाना, मेरी समझ से हास्यास्पद ही नहीं समस्या से मुंह चुराने जैसा । ठीक उसी तरह जैसे खतरा दिखने पर शुतुमुर्ग रेत में अपना सिर गाड़ लेता है, खुदको बचाने का उपाय करने के बजाए । तो ऐसा शुतुमुर्गी खेल मत खेलिए भाई लोग ।
16 जून 2009
अविनाश का यह पाखंड !
बहरहाल! यहां मुद्दा है पोस्ट को ‘फालतू’ करार देकर किसी ब्लागर को अपमानजनक ढंग से बाहर कर देने की । हेडिंग से ही आभास होता हैे कि पोस्ट में लड़कियों को चुस्त और छोटे कपड़े न पहनने की नसीहत देते हुए लड़कियों के ‘बेढंगे’ पहनावे को ही छेड़खानी आदि की वजह बताया गया होगा । ठीक है कि वैचारिक स्तर पर यह बात सस्ती लगती है और इसे सामाजिक रूप से मान्यता नहीं दी जा सकती । पर यहां इसे मान्यता देने का तो कोई सवाल ही नहीं था । सीधी सी बात थी अविनाश ने मोहल्ला पर लोगों को खुद ही अपने विचार व्यक्त करने की दावत दे रखी है । इसी के तहत एक आदमी ने अपने विचार व्यक्त किए । अब जरूरी तो नहीं कि यह आपकी सोच के अनुरूप हो और अगर यही आपका एटीट्यूट है तो फिर काहे को लोगों को बुलाते हो भई विचार व्यक्त करने को । खुद लिखते रहो अगड़म-बगड़म और अपने को मानते रहो ‘बड़का बुद्धिजीवी’ । रही बात पोस्ट को बेहूदा करार देने की तो अविनाश खुद जो लिखते-पेश करते रहते हैं वह भी अकसर कम बेहूदा नहीं होता । कुछ दिन पहले अविनाश ने ज्ञानोदय में छपी एक कविता पेश की कि ‘हमारे देवताओं को जननेद्री नहीं होती’ । ज्ञानोदय में यह कविता मैने भी पढ़ी थी और मुझे भी पसंद आई थी । पर हमारे देश का जो मानस है उसमें बहुत से लोगों को यह आपत्तिजनक ही नहीं, भड़काउ भी लग सकती है, इसके बावजूद अविनाश ने इसे ब्लाग पर पेश किया । दूसरी ओर बेढंगे कपड़ों की बात को उन्होंने बेहूदा करार दे दिया, जबकि सामाजिकता और व्यावहारिकता के लिहाज से देखें तो इस बात को सिरे से दरकिनार नहीं किया जा सकता । हमारे देश में शिक्षा को जो स्तर है, लोगों की संकुचित सोच और संकीर्ण संस्कार है, इससे भी बढ़कर दोहरा चरित्र है, उसके मद्देनजर तो यह एक व्यावहारिक ठहरती हैं । कहीं न कहीं एक सामाजिक हकीकत तो है ही इसमें । लड़कियों के रात में घर से बाहर निकलने को लेकर भी ऐसी ही सोच है हमारे समाज में कि रात में बाहर मत निकलो, अकेले तो कतई नहीं । अब इस बात को ठीक भले न माना जा सकता हो पर इससे जुड़े खतरों को अनदेखा तो नहीं किया जा सकता । एक ओर दिल्ली, मुंबई, बंगलोर, चंडीगढ़ जैसे महानगरों में बड़ी सख्या में लड़कियां काॅल सेंटर जैसी लाइन में नाइट शिफ्ट में काम करती हैं । इससे इतर भी देश की एक अपनी हकीकत है और यह हकीकत इस खुशनुमा तस्वीर से कहीं बड़ी है कि देश में आमतौर पर पढ़े-लिखे लोगों के घरों में भी लोग आम तौर पर लड़कियों को रात में बाहर जाने देने से हिचकिचाते हैं । तो इसे आप एक ‘बेहूदा विचार’ कह कर लिखने वाले को अपमानित करो, यह तो निरी तानाशाही है, कोरा पाखंड है। भई पहले जरा अपने गिरेबान में झांको कि तुम क्या लिखते रहते हो उल्टा-सीधा, खुद को नारीवादी, उत्तर-आधुनिक साबित करने के लिए । खुद को राजेन्द्र यादव के टक्कर का साबित करने के लिए लोगों की धार्मिक आस्थाओं को आहत करने से भी नहीं चूकते और दूसरों की व्यावहारिक बात को भी इस बदतमीजी के साथ बेहूदा और फालतू करार देते हो । क्या फालतू है, क्या अच्छा, पढ़ने को खुद ही फैसला करने दो । आयोजक की भूमिका में रहो, न्यायाधीश क्यों बन रहे हो भई ! और यदि सोच का दायरा इतना ही संकरा है तो फिर ऐसा इंतजाम करो कि पोस्ट को देखने के बाद ही उसे ब्लाग पर प्रकाशित करो । प्रकाशित करने के बाद उसे बेहूदा करार देने की बात शोभा नहीं देती, खासकर उस आदमी पर जो आए दिन खुद ही बेहद फालतू की चीजे लिखता रहता है, उस आदमी पर जिसे माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय और दैनिक भास्कर से - - - । खैर ! जाने दीजिए व्यक्तिगत मामलों पर मैं उतरना नहीं चाहता । कहना बस इतना ही है कि दूसरों को आईना दिखाने से पहले अविनाश आईने में अपना चेहरा देखें ।
13 जून 2009
ठीक कहा था डार्विन तुमने
सदियों पहले, ठीक कहा था ।
विज्ञान की आड़ में छुप कर,
समाज का गहरा-नंगा सच ।
दुरुस्त थीं सौ फीसदी,
अनुकूलन-प्राकृतिक चयन की
तुम्हारी दोनों ही अवधारणाएं
और सटीक था एकदम
योग्यतम की उत्तरजीविता का
वह विश्वव्यापी सिद्धांत ।
फलसफा कि जीने के लिए
चुना जाता है उन्हीं को बस
जो होते हैं समाज में ‘योग्यतम’ ।
कि ‘योग्यता’ ही तो बन गया है आज
मेमने की खाल ओढ़कर बैठ जाना,
आदमी होकर भी भेड़ सरीखा मिमियाना ।
हंसते-खेलते सीख ले जो
मिमियाने की यह कला ।
वही है सबसे क़ाबिल
वही है सबसे ‘अनुकूल’।
उसी को चुनेगी ‘व्यवस्था’
उसी को देगी फूल ।
उसी को चुनेगी ‘व्यवस्था’
कि खालिस आदमी चुनने में
छिपे पड़े हैं खतरे बेशुमार ।
खतरा आवाज उठाने जाने का,
खतरा अपना दिमाग चलाने का
और इस सबसे कहीं बढ़कर
खतरा खुद काबिज हो जाने का ।
इसीलिए आदमी से मेमना ही भला है।
वाकई ‘अनुकूलन’ ही आज
आदमी की सबसे बड़ी कला है ।
पूजा भी बनी प्रमोशनल इवेंट !
ये विज्ञापन और पीआर वाले जो करें सो कम जानिए । इन्हें अच्छी तरह पता है कि आदमी की भावनाओं को छुओ तो बात दिल तक असर करेगी । उन्हें पता है कि धर्म-अध्यात्म, मंदिर, पूजा, प्रसाद, घंटी, आरती यह सब चीजें हमारे देश की बहुसंख्यक आबादी के दिमाग ही नहीं दिल और आत्मा से जुड़ी चीजें हैं । सो, इसी निशाने पर ‘मार’ करने के लिए किया गया ‘प्रमोशनल पूजा’ का आयोजन । पुरानी कहावत है कि जब अपना ही सिक्का खोटा हो तो दूसरे को क्या दोष दें । वही बात यहां भी लागू होती है । यह कम से कम बेचारी क्लाडिया का आइडिया तो नहीं रहा होगा । फिल्म के प्रचार प्रसार से जुड़े हमारे किसी भारतीय पब्लिसिटी गुरू के दिमाग में ही उपजा होगा यह ‘नेक ख्याल’ । इस पर तुर्रा यह कि आलोचना कीजिए तो कहेंगे कि हमतो भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं । विदेशियों तक को इसके रंग में सराबोर कर रहे हैं । इससे हालीवुड तक बिखर जाएगी हमारी संस्कृति की सुगंध । ज्यादा कहिएगा तो पूजा के बाद पांच हजार भूखे-नंगों को प्रसाद बंटवा देंगे, लंगर खिलवा देंगे । हो गया न आपका मुंह बंद ! बोलिए अब क्या बोलियेगा ! तो इस तरह काम करता है इनका तंत्र । पैसा, संस्कृति, रुतबा, सेटिंग सबकुछ है इनके पिटारे में । जहां जैसी जरूरत पड़ी मुंह पर फेक कर करा देंगे बोलती बंद । आजकल भगवान से भी बढ़कर है इनकी महिमा ।
12 जून 2009
ठीक कहा था डार्विन
सदियों पहले, ठीक कहा था ।
विज्ञान की आड़ में छुप कर,
समाज का गहरा-नंगा सच ।
दुरुस्त थीं सौ फीसदी,
अनुकूलन-प्राकृतिक चयन की
तुम्हारी दोनों ही अवधारणाएं
और सटीक था एकदम
योग्यतम की उत्तरजीविता का
वह विश्वव्यापी सिद्धांत ।
फलसफा कि जीने के लिए
चुना जाता है उन्हीं को बस
जो होते हैं समाज में ‘योग्यतम’ ।
कि ‘योग्यता’ ही तो बन गया है आज
मेमने की खाल ओढ़कर बैठ जाना,
आदमी होकर भी भेड़ सरीखा मिमियाना ।
हंसते-खेलते सीख ले जो
मिमियाने की यह कला ।
वही है सबसे क़ाबिल
वही है सबसे ‘अनुकूल’ ।
उसी को चुनेगी ‘व्यवस्था’
उसी को देगी फूल ।
उसी को चुनेगी ‘व्यवस्था’
कि खालिस आदमी चुनने में
छिपे पड़े हैं खतरे बेशुमार ।
खतरा आवाज उठाने जाने का,
खतरा अपना दिमाग चलाने का
और इस सबसे कहीं बढ़कर
खतरा खुद काबिज हो जाने का ।
इसीलिए आदमी से मेमना ही भला है।
वाकई ‘अनुकूलन’ ही आज
आदमी की सबसे बड़ी कला है ।