11 जून 2009

बहस को गलत दिशा में मत मोड़िये हुजूर

भई मसिजीवी जी ! बातों को गलत आलोक में न लें । न तो महिलाओं के लिए विधायिका में आरक्षण का मैं विरोध कर रहा हूं न ही यह कह रहा हूं कि विनय कटियार जो कह रहे हैं वही शब्दशः सही है और वही होना चाहिए । मैंने महज यह सवाल उठाया है कि इसका असल लाभ महिलाओं के किस वर्ग को मिलेगा । बात को होलिस्टिक एप्रोच से देखा जाए तो कहने का तात्पर्य महज इतना है कि महिला सशक्तीकरण की सारी कवायदें इस तरह होनी चाहिए कि इसका लाभ महज ऐसे वर्ग तक सीमित न रह जाए जो पहले से ही सक्षम और संपन्न है, बल्कि ऐसी जरूरतमंद महिलाओं तक पहुंचे जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा दरकार है । बात को और सरलीकृत करू तो मान लीजिए कि मिठाई बंटनी है तो वितरण की प्रक्रिया शुरू करने से पहले ही ऐसे उपाय कर दिए जाएं कि पहले लड्डू उनको मिलें जिन्हें अबतक नहीं मिले हैं नकि उनको जो पहले से ही दर्जन भर हजम कर चुके हैं और फिर लाइन में खड़े हो गए है । व्यावहारिक रूप में ऐसा होने की संभावना ही ज्यादा रहती है क्योंकि पहले लड्डू पाने वाले उसे पाने की कला से परिचित और सिद्धहस्त होते हैं । ऐसे में वितरण के लाभ में उनके भी शुमार हो जाने से कहीं न कहीं जरूरतमंदों का हक मारा जाएगा । बस इतना ही आशय है हमारा भाई, वर्ना कौन सा हम चुनाव लड़ने जा रहे हैं कि महिलाओं के लिए कोई सीट आरक्षित हो जाएगी तो हमारा टिकट कट जाएगा । रही बात आपके सवाल की कि कब कौन सी सीट महिलाओं के लिए आरक्षित हुई तो कहना महज इतना है कि हम कोई लिस्ट लेकर नहीं बैठै हैं भई । एससी-एसटी के लिए कुछ सीटें आरक्षित हैं वही भी बदलती रहती हैं, जहां तक हमें याद पड़ता है कि इसी आरक्षण के भीतर कुछ सीटें संभवतः महिलाओं के लिए भी थीं । या चलिए मेरी याददाश्त में खामी भी हो सकती है तो विधानसभा, लोकसभा की बात छोड़ दें, नगर निगम और पंचायत में तो महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित थीं । इससे समाज में क्या बदलाव आया । मेरे अपने वार्ड में सीट आरक्षित थी तो हुआ यह कि सभी पुराने उम्मीदवारों ने अपनी पत्नियों से पर्चे भरवा दिए । प्रचार से लेकर चुनावी संग्राम तक पतिदेव ही हावी रहे । चुनाव के पोस्टरों तक पर उम्मीरवार पत्नी का नाम बहुत छोटे अक्षरों में था फोटो में पतिदेव ही हाथ जोड़े-मुस्कराते नजर आ रहे थे । नाम भी उनका ही चमक रहा था । पुराने पार्षद की पत्नी के चुनाव जीतने के बाद भी यही जारी रहा । पत्नी महज कागजों पर पार्षद थी, कागजों पर दस्तखत करने भर को उसमें भी इंकार का विकल्प उस बेचारी के पास नहीं था । क्या यह किसी लोकतांत्रिक सुधार प्रक्रिया के साथ मजाक नहीं हुआ ! लालू-राबड़ी का उदाहरण भी इसी की इन्तेहा को दर्शाने के लिए मैने दिया, नकि इसके जरिए यह कहा कि महिलाओं को आरक्षण देना एक फालतू बात है, इससे कोई लाभ नहीं होगा । लाभ क्यों नहीं होगा भाई, जरूर होगा, जरूर मिलना चाहिए महिलाओं को आरक्षण और 33 प्रतिशत क्यों आधी आबादी को 50 फीसदी आरक्षण दीजिए । बस इतना सुनिश्चित कर लीजिए कि इसका फायदा समाज के निचले तबके तक पहुंच जाए क्योंकि तभी समानता आधारित समाज का हम निर्माण कर पाएंगे । इसलिए हे मसिजीवी ! तथ्यों और विवेचनाओं को लेकर बहस को गलत दिशा में मत मोड़ें क्योंकि सामाजिक सच्चाइयों को इस तरह नकारा नहीं जा सकता
‘किस वर्ग की महिलाएं आएंगी’ यह तर्क फूहड़ है और ‘जो पुरुष आ रहे हैं किस वर्ग से आ रहे हैं’ के जरिये क्या कहना चाह रहे हैं आप ! कि व्यवस्था में जो खामी वर्तमान में बनी हुई है वह आगे किए जाने वाले प्रावधानों और सुधारों में भी बनी रहे । जिस वर्ग के पुरुष आ रहे हैं ज्यादातर ठीक नहंी आ रहे हैं, यह बात तो सभी मानते हैं और इसमें सुधार की जरूरत भी शिद्दत से महसूस करते हैं । आश्चर्य है ! आप नए प्रावधानों में भी इसे जारी रखने की हिमायत कर रहे हैं यह कह कर कि अभी जो हो रहा है वह कौन सा सही है! तो आगे भी गलत होने दीजिए ! दूसरी बात तो अपने आप में विरोधाभासी है कि सांसद-विधायक अपने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने आएंगे लैंगिकता का नहीं । अरे भाई लैंगिकता के आधार पर आधारित सीट से अगर जीतकर आएंगे तो क्या यह लैंगिकता का प्रतिनिधित्व नहीं होगा तीसरी बात पासवान और यादव त्रयी की । इनको आप रोल माडल के रूप में पेश कर रहे हैं! कि खाने-अघाने के बाद भी यह दलितों के प्रतिनिधित्व का दावा कर रहे हैं तो आप
भी यही बेशर्मी करें । युक्तिसंगत तो यही है कि अबतक की व्यवस्थाओं में जो कमियां रह गई हैं वह आगे के सुधारों में जड़ न जमाने पाएं हमारा तो यही मानना है भाई । बाकी आपकी बौद्किता और आपकी व्याख्या आप ही जाने ।

2 टिप्‍पणियां:

  1. बिलकुल उचित प्रश्न है
    महिलाओं को कितना फायदा मिलेगा

    फिर से कोई लालू राबड़ी को आगे कर देगा ...
    वीनस केसरी

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