19 जून 2009

दिमाग की खिड़कियां खोलो अविनाश !

मोहल्ला से फिर एक ब्लागर को निकाल दिया गया । सलीम खान नाम के इस शख्स पर आरोप था अपने धर्म, इस्लाम का प्रचार करने का । यानि मोहल्ले में धर्म या मजहब की बात करना कुफ्र है, गुनाह है । इस एकतरफा कार्रवाई के औचित्य पर चर्चा बाद में करेंगे । पहले यह कहना चाहूंगा कि यदि ब्लाग में किसी को शामिल करने या बेदखल करने के ब्लागर के विशेषाधिकार को मान भी लिया जाए तो सलीम को मोहल्ले से बेदखल करने के लिए अविनाश ने जिस भाषा, जिस शब्दावली का इस्तेमाल किया वह अस्वस्थ और आपत्तिजनक है ।
अविनाश की पोस्ट में कहा गया कि हमें मोहल्ले में सलीम साहब की सोहबत नहीं चाहिए - - - क्योंकि उनका उद्देश्य इस्लाम का प्रचार करना है - - - । यहां दो बातों पर मैं खास ध्यान दिलाना चाहूंगा । पहला है ‘सोहबत’ शब्द । बहुत महत्वपूर्ण शब्द है सोहबत, जिसे हिन्दी में सानिध्य या संगत कहते हैं । इसी संगत को लेकर कहावत है कि ‘संगत से गुण आत है, संगत से गुण जाए’ ।
‘सलीम साहब की सोहबत नहीं चाहिए’ का मतलब है उनकी सोहबत खराब है या बिगाड़ने वाली है । क्यों बिगाड़ने वाली है, क्यों कि वह इस्लाम की बात करते हैं । ब्लाग के मेजबान ‘परम विद्वान’ अविनाश जी की सोहबत बड़ी भली है क्योंकि वह इसी ब्लाग पर कविता छाप रहे हैं कि ‘हमारे देवताओं को जननेन्द्री नहीं होती’ । लोगों के ज्ञान के साथ-साथ बड़ी सामाजिक समरसता बढ़ा रहे हैं अविनाश और सलीम इस्लाम के बारे में कुछ बता रहे हैं तो गुनाह कर रहे हैं । इस लिए मोहल्ले को उनकी सोहबत नहीं चाहिए, उन्हें बेदखल किया जाता है । उनके सभी लेखों को हटा दिया गया, उनका आईडी तक ब्लाक कर दिया गया जिसे बहाल करने की सलीम बार-बार गुजारिश कर रहे हैं । खुद मोहल्ला के कुछ टिप्पणीकार भी इस एक तरफा फैसले पर ऐतराज जता चुके हैं , पर अविनाश के कान पर जूं नहीं रेंग रही, क्योंकि वो इस मोहल्ले के ‘दादा’ हैं, दादागिरी चलती है उनकी यहां । जिसे चाहें रखें, जिसे चाहें तड़ीपार कर दें । अरे यार ! जरा दिमाग का दरवाजा खोलो, खिड़कियां खोलो । क्या समझते हो खुद को । क्या दिखाना चाहते हो यह सब करके कि कार्ल माक्र्स के बाद इस धरती पर तुम ही बचे हो महान । माक्र्स ने धर्म अफीम है, कह कर खुद को धर्म-कर्म के बंधन से उपर साबित किया था और माक्र्स के बाद अब तुम खुद को साबित कर रहे हो देवताओं को जननेन्द्री नहीं होती कह कर, मजहब की बात करने वाले सलीम को बेदखल करके । क्या समझते हो खुद को, किस ख्वामख्याली में जी रहे हो भाई ।
गौरतलब है कि सलीम को बेदखल करते वक्त कारण महज यह बताया गया कि उनका उद्देश्य इस्लाम का प्रचार करना है । यह नहीं कहा गया कि वह कोई आपत्तिजनक बातें कह रहे हैं या उनकी फलां-फलां बातें आपत्तिजनक हैं । अरे यार ! जननेन्द्री वाली कविताओं को छोड़ कर कभी-कभी कुछ और भी पढ़ लिया करो । सदियों पहलने रहीम कह गए थे कि -
कह रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग
चंदन विष व्यापत नहीं, लपटे रहत भुजंग ।
जरा इस दोहे से भी तो कुछ सीख लो सीख लो । जो धर्म की मजहब की बात कर रहा है, करने दो । तुम अपनी बात करो । जिसे उसकी पढ़नी होगी, उसकी पढ़ेगा । जिसे तुम्हारी पढ़नी है, तुम्हारी पढ़ेगा । क्या दिक्कत है इसमें । कुछ आपत्तिजनक बात करता है कोई, तो बेशक हटा दो उसका उल्लेख करते हुए, पूरा अधिकार है ब्लाग के मेजबान को, पर बेअदबी और मनमानी तो ठीक नहीं । सलीम कोई ओसामा बिन लादेन का यशोगान तो नहीं कर रहे थे, न ही इस्लाम के नाम पर अमेरिका पर एक और हमला करने का आह्वान कर रहे थे । चीजों की अपने धर्म के अनुसार व्याख्या कर रहे थे । अपने धर्म को युक्तिसंगत और महान बता रहे थे । वह तो हर कोई करता है । हिन्दू भी करता है, ईसाई भी करता है । तो महज इस्लाम के प्रचार का आरोप लगाकर किसी को निकालना उचित है क्या !
जरा अपने ब्लाग के नाम पर भी गौर करो भइया ! मोहल्ला । भई जहां तक हमने देखा है मोहल्ले में हर किस्म के, हर मजहब को मानने वाले लोग अपने-अपने तरीके से रहते हैं। मोहल्ले में मंदिर भी होता है, मस्जिद भी होती है । मंदिर में आरती-भजन, तो मस्जिद में अजान और नमाज होती है । तो अविनाश का यह कैसा मोहल्ला है जहां अजान की इजाजत नहीं । और क्यों नहीं ! जरा इसपर भी ठंडे दिमाग से गौर करो । अब बातें तो बहुत सी हैं, पर बात निकलेगी तो बहुत दूर तलक जाएगी। इसलिए फिलहाल इतना ही । इस गुजारिश के साथ कि यह सबकुछ किसी को नीचा दिखाने या कोरी आलोचना के लिए नहीं लिख रहा । महज चीजों को एक होलिस्टिक एप्रोच में, खुले दिमाग से देखने के लिए कह रहा हूं । इसके अलावा मेरी इस पोस्ट का कोई और मकसद न है, न समझा जाए ।

2 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लोगर का विशेषाधिकार तो अपनी जगह है ही लेकिन बहस इस बात पर होनी चाहिये कि ब्लॉग पर किसी भी धर्म का प्रचार या दुष्प्रचार जायज़ है या नहीं? क्यों ना ब्लोग को इन बातों से अलग रखा जाये.?

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  2. आपकी इस सोच के अपने आधार हो सकते हैं, पर मेरा मानना है कि धर्म कोई वर्जना नहीं, कोई उन्माद नहीं । तो इसे क्यों अलग रखा जाए । यह तो हमारी रोजाना के जीवन से जड़ी जीच है ठीक वैसे ही जैसे साहित्य, मनोरंजन, अर्थ, विज्ञान हमारे जीवन से जुड़े हुए हैं । जब इन पर चर्चा करने में कोई हर्ज नहीं तो धर्म में क्या बुराई है । पाबंदियां और कट्टरवादिता जैसी चीजें तो हमारे अपने दिमाग का फितूर होती हैं जिनका हम धर्म में घालमेल कर देते हैं । वर्ना यह सब धर्म का हिस्सा नहीं । दूसरे मेरा मानना यह है कि अगर मोहल्ले में इसकी चर्चा होती है तो यह एक अवसर है दूसरे के धर्म को जानने का, वर्ना रोजमर्रा की जिंदगी में हिन्दू इस्लाम को जानने के लिए मस्जिद जाने से रहा और मुस्लिम मंदिर आने से रहा । ऐसे वैचारिक मंचों पर ही यह काम व्यावहारिक रूप से संभव हो पाता है ।

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